Khatu Shyam Temple | खाटू श्याम मंदिर – हारे का सहारा..!!

हमारे देश में बहुत से ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो अपने चमत्कारों व वरदानों के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हीं मंदिरों में से एक है राजस्थान में शेखावाटी क्षेत्र के सीकर जिले का विश्व विख्यात प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर। खाटू श्याम मंदिर में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की श्याम यानी कृष्ण के रूप में पूजा की जाती है। खाटू श्याम मंदिर में श्याम बाबा का धड़ से अलग शीष और धनुष पर तीन बाण की छवि वाली मूर्ति स्थापित हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार, बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त किया था कि वे कलयुग में उनके नाम श्याम से पूजे जाएँगे।

कलयुग के अवतार कहे जाने वाले खाटू श्याम जी की मान्यता बरसों से चली आ रही है। खाटू श्याम मंदिर के दर्शन मात्र से ही जीवन में खुशियों एवं सुख-शांति के भंडार भर जाते हैं। लोगों का विश्वास है कि बाबा श्याम सभी की मुरादें पूरी करते हैं और रंक को भी राजा बना सकते हैं।

खाटू श्याम मंदिर का इतिहास –
History of Khatu Shyam Temple –

खाटू नगरी में एक गाय जो रोज घास चरने जाती थी, रोज जमीन के एक भाग पर खडी हो जाती थी। उसके थनों से स्वता दूध की धार उस धरा में समां जाती थी। जेसे की कोई जमीन के अन्दर से उस गौ माँ का दूध पी रहा है। घर पर आने के बाद गौ मालिक जब उसका दूध निकालने की कोशिश करता तो गौ का दूध उसे मिल नही पाता था। यह क्रम बहूत दिनों तक चलता रहा। गौ मालिक से सोचा की कोई न कोई ऐसा जरुर है जो उसकी गाय का दूध निकल लेता है। एक दिन उस गौ मालिक ने उस गाय का पीछा किया। उसने संध्या के समय जब यह नज़ारा देखा तो उसकी आँखे इस चमत्कार पर चकरा गयी। गौ माँ का दूध अपने आप धरा के अन्दर समाने लगा, गौ मालिक अचरज के साथ गाव के राजन के पास गया और पूरी कहानी बताई। राजा और उनकी सभा को इस बात पर तनिक भी यकींन नही आया। पर राजा यह जानना चाहता था की आखिर माजरा क्या है। राजा अपने कुछ मंत्रियो के साथ उस धरा पर आया और उसने देखा की गौ मालिक सही बोल रहा है। उसने अपने कुछ लोगो से जमीन का वो भाग खोदने के लिए कहा।

जमीन का भाग जेसे ही खोदा जाने लगा, उस धरा से आवाज आई , “अरे धीरे धीरे खोदो , यहा मेरा शीश है।” उसी रात्रि राजा को स्वपन आया की राजन अब समय आ गया है मेरे शीश के अवतरित होने का। मैं महाभारत काल में बर्बरीक था और मेने भगवान श्री कृष्ण को अपना शीश दान में दिया था। फलस्वरूप उन्होंने मुझे कलियुग में पूजे जाने का वरदान दिया था, खुदाई से मेरा शीश उसी धरा से मिलेगा और तुम्हे मेरा मंदिर बनाना होगा। सुबह जब राजा उठा तो तो स्वपन की बात को ध्यान रखकर खुदाई पुनः शरू करा दी, और फिर कलयुग के अवतार कहे जाने वाले खाटू श्याम जी का शीश उस धरा से अवतरित हुआ।

वो जगह जहा से शीश को निकाला गया उसे श्याम कुंड कहा जाता है। उसके पश्चात उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की शुक्ल एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा बनाया गया था। 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। मंदिर की रक्षा के लिए उस समय अनेक राजपूतों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था। लेकिन वर्तमान मं‍दिर का जीर्णोद्धार मारवाड़ के दीवान अभय सिंह ने 1720 में कराया।

खाटू श्याम जी की कथा –

महाबली भीम एवं हिडिम्बा के पुत्र वीर घटोत्कच का विवाह प्रागज्योतिषपुर ( वर्तमान आसाम ) के राजा मूर की पुत्री कामकटंकटा से हुआ। माता कामकटंकटा को “मोरवी” नाम से भी जाना जाता है। वीर घटोत्कच व माता मोरवी को एक पुत्ररतन की प्राप्ति हुई जिसके बाल बब्बर शेर की तरह होने के कारण इनका नाम बर्बरीक रखा गया। ये वही वीर बर्बरीक हैं जिन्हें आज हम खाटू के श्री श्याम, कलयुग के आवतार, श्याम सरकार, तीन बाणधारी, शीश के दानी, खाटू नरेश, मोरवीनंदन व अन्य अनगिनत नामों से जानते हैं।

बर्बरीक भगवती जगदम्बा का उपासक था। बर्बरीक ने भगवती जगदम्बा की आराधना करके भगवती जगदम्बा से तीन अभेध्य बाण एवं कई शक्तियाँ प्रदान की, जिससे तीनो लोको में विजय प्राप्त की जा सकती थी। महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने पर वीर बर्बरीक ने अपनी माता के सन्मुख युद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की। तब इनकी माता मोरवी ने इन्हे युद्ध में भाग लेने की आज्ञा इस वचन के साथ दी की तुम युद्ध में हारने वाले पक्ष का साथ निभाओगे, वीर बर्बरीक युद्ध में भाग लेने के लिए अपने घोड़े, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभुमि की और अग्रसर हुये।

“बाबा ने हारने वाले पक्ष का साथ देने का प्रण लिया था, इसीलिए बाबा को हारे का सहारा भी कहा जाता है।”

इस दौरान मार्ग में बर्बरीक की मुलाकात भगवान श्री कृष्ण से हुई। ब्राह्मण भेष धारण भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के बारे में जानने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हंसी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में शामिल होने आए हैं। कृष्ण की ये बात सुनकर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि उनका केवल एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिए काफी है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तूणीर में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो पूरे ब्रह्माण्ड का विनाश हो जाएगा। यह जानकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस वृक्ष के सभी पत्तों को वेधकर दिखलाओ। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। बाण ने क्षणभर में पेड़ के सभी पत्तों को वेध दिया और श्री कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था। बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए अन्यथा ये बाण आपके पैर को भी वेध देगा।

तत्पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा। बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन को दोहराया और कहा युद्ध में जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा उसी को अपना साथ देगा। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की निश्चित है। और अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में चला जाएगा।

अत: ब्राह्मणरूपी भगवान श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की। बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया और दान माँगने को कहा। ब्राह्मण ने उनसे शीश का दान माँगा। वीर बर्बरीक क्षण भर के लिए अचम्भित हुए, परन्तु अपने वचन से अडिग नहीं हो सकते थे। वीर बर्बरीक बोले एक साधारण ब्राह्मण इस तरह का दान नहीं माँग सकता है, अत: ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया तो बर्बरीक ने खुशी-खुशी शीश दान देना स्वीकर कर लिया।

इस बलिदान से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के शीश को कलियुग में देव रूप में पूजित होकर भक्तों की मनोकामनाओ को पूर्ण करने का वरदान दिया। वीर बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष महाभारत के युद्ध देखने की अपनी प्रबल इच्छा को बताया, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के शीश को ऊंचे पर्वत पर रखकर पूरा किया एवं उनके धड़ का अंतिम संस्कार शास्त्रोक्त विधि से सम्पूर्ण करवाया। महाभारत क युद्ध समाप्ति पर महाबली श्री भीमसेन को यह अभिमान हो गया कि, यह महाभारत का युद्ध केवल उनके पराक्रम से जीता गया है, तब श्री अर्जुन ने कहा कि, वीर बर्बरीक के शीश से पूछा जाये की उसने इस युद्ध में किसका पराक्रम देखा है। तब वीर बर्बरीक के शीश ने महाबली श्री भीमसेन का मान मर्दन करते हुए उत्तर दिया की यह युद्ध केवल भगवान श्री कृष्ण की निति के कारण जीता गया। और इस युद्ध में केवल भगवान श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र चलता था, अन्यत्र कुछ भी नहीं था। वीर बर्बरीक के द्वारा ऐसा कहते ही समस्त नभ मंडल उद्भाषित हो उठा। एवं उस देव स्वरुप शीश पर पुष्प की वर्षा होने लगी। देवताओं की दुदुम्भिया बज उठी। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने पुनः वीर बर्बरीक के शीश को प्रणाम करते हुए कहा – “हे वीर बर्बरीक आप कलिकाल में सर्वत्र पूजित होकर अपने सभी भक्तो के अभीष्ट कार्य को पूर्ण करोगे।

खाटू श्याम जी का फाल्गुन मेला –

खाटू नगरी में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को श्याम बाबा का विशाल मेला लगता है। फाल्गुन मेला खाटू श्याम जी का मुख्य मेला है। यह मेला 10 दिनों के लिए लगाया जाता है। जिसमे भक्त श्याम बाबा के साथ होली का त्यौहार मानते हैं। जिसमें देश-विदेशों से कई लाख श्रद्धालु शामिल होते हैं। खाटू श्याम का मेला राजस्थान में लगने वाले बड़े मेलों में से एक है। खाटूश्याम जी के मेले का आकर्षण यहां होने वाली मानव सेवा भी है। बड़े से बड़े घराने के लोग आम आदमी की तरह यहां आकर श्रद्धालुओं की सेवा करते हैं। कहा जाता है ऐसा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

श्याम बाबा की आरती की समय-सारणी –

  • पट खुलने का समय : प्रात: 5:00 बजे
  • मंगल आरती : प्रात: 5:30 बजे
  • शृंगार आरती : प्रात: 7:45 बजे
  • भोग आरती : दोपहर 12:30
  • पट बंद होने का समय : दोपहर 1 बजे
  • पट खुलने का समय : सायं 4:00 बजे
  • ग्वाला आरती : सायं 7:00 बजे
  • शयन आरती : रात्रि 9:15 बजे
  • मंदिर बंद होने का समय रात्रि 9:30 बजे

 विशेष अवसर पर समय परिवर्तन भी हो सकता है।

खाटू श्याम  कैसे पहुँचें –
How to Reach Khatu Shyam –

हवाई मार्ग – यहां से निकटतम हवाई अड्‍डा जयपुर है, जो कि यहाँ से करीब 80km की दूरी पर स्थित है। वह से आप बस या टैक्सी की मदद से खाटू धाम पहुंच सकते है।

रेलमार्ग – खाटू धाम का निकटतम रेलवे स्टेशन रींगस (Ringus) जंक्शन है। जो यहाँ से 15km दूर है।

सडक मार्ग – खाटू धाम से जयपुर, सीकर आदि प्रमुख स्थानों के लिए राजस्थान राज्य परिवहन निगम की बसों के साथ ही टैक्सी और जीपें भी यहां आसानी से उपलब्ध हैं।

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