Bikaner – History and Tourist Places | बीकानेर – इतिहास और दर्शनीय स्थल

बीकानेर राजस्थान राज्य में रेगिस्तान का एक शहर है। जो, जोधपुर से 245km, जयपुर से 333km दूर है। बीकानेर राज्य का पुराना नाम जांगलू देश था। बीकानेर के राजा जांगलू देश के स्वामी होने के कारण अब तक “जंगल धर बादशाह’ कहलाते हैं। जांगलू पश्चिमी राजस्थान का वो हिस्सा है जिसे हम लोग आज बीकानेर, चुरू हनुमानगढ़ और श्री गंगानगर के नाम से जानते हैं। इसके उत्तर में कुरु और मद्र देश थे, इसलिए महाभारत में जांगलू नाम कहीं अकेला और कहीं कुरु और मद्र देशों के साथ जुड़ा हुआ मिलता है। बीकानेर शहर बीकानेर जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है और राजस्थान के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है।

यह शहर अपने प्राचीन मंदिरों, विशाल किलों, हड़प्पा सभ्यता की संस्कृति के अवशेषों और महलों के लिए जाना जाता है। बीकानेर अपने गौरवशाली इतिहास के साथ-साथ सांस्कृतिक महत्व के लिए भी काफी ज्यादा प्रसिद्ध है। यहां की प्राचीन इमारतें राजस्थानी संस्कृति को भली भांति प्रदर्शित करती हैं। बीकानेर ऊँटो के सफर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। देश-विदेश के सैलानी यहाँ दूर-दूर से ऊँटो की सवारी का आनन्द लेने आते है।

बीकानेर का इतिहास –
History of Bikaner –

बीकानेर, राठौर राजकुमार राव बीकाजी द्वारा वर्ष 1488 में स्थापित किया गया था। बीकाजी का जन्म 5 अगस्त 1438 में जोधपुर में हुवा था। इनके पिता राव जोधा (जोधपुर के संस्थापक) व माता रानी नौरंगदे थी। कहते हैं कि साल 1465 में राव जोधा की कड़वी बातों से नाराज होकर उसके छोटे बेटे बीका ने जोधपुर छोड़ दिया। निकलते वक़्त उसने अपने पिता से कहा कि वो खुद अपना राज्य स्थापित करके दिखा देगा । जब बीका जोधपुर से निकला तो उसके पास 100 घुड़सवारों और 500 पैदल की छोटी सी सेना थी और साथ थे उसके चाचा रावत कांधल।

बीका अपने लश्कर के साथ जांगलू पहुंचा। यहां वो उन्ही करणी माता की शरण में गया, जिसने किसी दौर में उसके दादा और बाद में उसके पिता को शरण दी थी। करणी माता की सलाह पर बीका ने धीरे-धीरे करके जांगलू के छोटे-छोटे ग्राम राज्यों पर कब्जा जमाना शुरू किया। बीका के आने से पहले यहां जाटों की सात बिरादरियां छोटे-छोटे गणराज्यों में रहा करती थीं। गोत्र के हिसाब से उनके अलग-अलग इलाके बंटे हुए थे। इन इलाकों को ‘सात पट्टी, सत्तावन मांझ’ के नाम जाना जाता था।

इनमें से सबसे बड़ी गोत्र थी गोदारा। गोदारा जाटों का चौधरी पांडू, सारण गोत्र के चौधरी पूला सारण की बीवी मलकी को भगाकर अपने घर ले आया था। इसके बाद सारण गोत्र के चौधरी पूला ने पूनिया, बेनीवाल, जोहिया, सिहाग और कस्वां चौधरियों को अपने साथ लेकर गोदारा गोत्र के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। इधर बीका भी अपने लिए नए राज्य की तलाश में था। यह जांगलू में पैर जमाने का अच्छा मौक़ा था। युद्ध में मदद के बदले पांडू ने बीका की अधीनता स्वीकार कर ली। उनके बीच हुई संधि के हिसाब से बीका को पांडू के अधीन 300 गांवों में प्रति परिवार एक रुपया और प्रति 100 बीघा खेत पर 2 रुपए का लगान वसूलने का हक मिल गया। गोदाराओं के पतन के बाद दूसरे जाट गोत्रों ने एक-एक करके बीका की अधीनता स्वीकार कर ली। जोधपुर से निकलने के कुछ ही सालों में बीका 2500 गांवों का मालिक बन गया। इस तरह राजस्थान में राठौड़ों के दूसरे बड़े राज्य की स्थापना का रास्ता खुला, जिसे बाद में बीकानेर के नाम से जाना गया। गांवों पर कब्जे के बाद बीका को नई राजधानी की जरूरत महसूस हुई। उसने 1485 में बीकानेर में किले की नींव रखने के लिए देशनोक से करणी माता को बुलवाया।

बीका ने जब बीकानेर की स्थापना की तो पड़ोस के भाटी राजपूत असहज स्थिति में थे। जांगलू के आगे थार भाटी और राठौड़ राजपूतों के बीच बफर जोन की तरह था। जांगलू में बीका के कब्जे के बाद भाटी राजपूतों की हरारत स्वाभाविक थी। करणी माता ने तनाव की स्थिति में जरूरी हस्तक्षेप किया और बीका की शादी पूगल के भाटी शासक राव शेखा की बेटी रंग कँवर के साथ करवाया। इससे नए बसे बीकानेर पर से युद्ध का बड़ा खतरा टल गया।

बीकानेर के राजा

राव बीकाजी (1465-1504) की मृत्यु के पश्च्यात

  • राव नरसी (1504-1505)
  • राव लूणकरण (1505-1526)
  • राव जैतसी (1526-1542)
  • राव कल्याणमल (1542-1573)
  • राय सिंह (1573-1612)
  • कर्ण सिंह (1631-1669)
  • अनूप सिंह (1669-1698)
  • सरूपसिंह (1698-1700)
  • सुजान सिंह (1700-1736)
  • जोरावर सिंह (1736-1746)
  • गजसिंह (1746-1787)
  • राजसिंह (1787)
  • प्रताप सिंह (1787)
  • सुरत सिंह (1787-1828)
  • रतन सिंह (1828-1851)
  • सरदार सिंह (1851-1872)
  • डूंगरसिंह (1872-1887)
  • गंगासिंह (1887-1943)
  • सार्दुल सिंह (1943-1950)
  • करणीसिंह (1950-1988)
  • नरेंद्रसिंह (1988-वर्तमान)

यह सब बीकानेर के शासक हुए।

बीकानेर का मशहूर भुजिया उद्योग

बीकानेर भुजिया उद्योग का उद्गम स्थल रहा है, जो कि 1877 में राजा, श्री ड़ूगर सिंह के शासनकाल में शुरू किया गया। भुजिया सबसे पहले ड़ूगरशाही के नाम से शुरू की गई जो कि राजा के मेहमानों की सेवा के तहत निर्मित की गई। बीकानेर, जो कि बीकानेरी भुजिया, मिठाई और नमकीन के लिए जाना जाता है यह शहर ‘बीकाजी’ और ‘हल्दीराम जैसे विश्व प्रसिद्ध वैश्विक ब्रांडों का उद्गम स्थल रहा है। बीकानेरी भुजिया एक लोकप्रिय नाश्ता है जो की बेसन, मसाले, कीट दाल, वनस्पति तेल, नमक, लाल मिर्च, काली मिर्च, इलायची, और लौंग के साथ तैयार की जाती है।

बीकानेर के दर्शनीय स्थल
Tourist Places In Bikaner –

जूनागढ़ का किला (Junagarh Fort) –– बीकानेर जंक्शन रेलवे स्टेशन से 2km की दूरी पर, जूनागढ़ का किला एक ऐतिहासिक किला है यह राजस्थान के कुछ प्रमुख किलों में से एक है जो एक पहाड़ी की चोटी पर नहीं बनाया गया है। और बीकानेर में देखने के लिए प्रमुख स्थानों में से एक है। जूनागढ़ किला मूल रूप से 1589 और 1593 ईस्वी के बीच बीकानेर के 6 वें शासक राजा राय सिंह द्वारा बनाया गया था। इस किले में अनेक खुबसुरत महल है, जिनमे चन्द्रमहल तथा फुलमहल प्रमुख है इसके अतिरिक्त इस किले में अनूपमहल ,धरनमहल , बीजनमहल , डूंगर निवास, गंगा निवास और रंगमहल भी दर्शनीय है।

लालगढ़ महल (Lal Garh Palace)–– बीकानेर जंक्शन रेलवे स्टेशन से 4 km की दूरी पर, लालगढ़ महल बीकानेर में स्थित एक शाही महल है। लालगढ़ महल बीकानेर और राजस्थान में सैलानियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण है। इसे बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने 1902 में  लाल बलुआ  पत्थरों से अपने पिता, राजा लाल सिंह की स्मृति में बनवाया था। इसकी मुगल, राजपूत और यूरोपीय शैली की वास्तुकला सैलानियों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। यह महल वास्तुकार सर स्विंटन याकूब के द्वारा डिजाइन किया गया था। आज के समय में यहां एक संग्रहालय, एक हेरिटेज होटल और एक लक्जरी होटल है।

सादुल सिंह संग्रहालय (Sadul Singh Museum) – सादुल सिंह संग्रहालय बीकानेर के मशहूर संग्रहालयों में से एक है। यह संग्रहालय बीकानेर के लालगढ़ पैलेस की पहली मंजिल पर स्थित है। यहाँ आप पुरानी तस्वीरें, शिकार, ट्राफियां, जॉर्जियाई चित्रों, और कलाकृतियों की बड़ी पर्दर्शनी देख सकते हैं। यह कला संग्रहालय गंगा सिंह, सादुल सिंह और करनी सिंह सहित बीकानेर के सफल राजाओं को समर्पित संग्रहालय है। यहां वन्यजीवन से जुड़े कई स्मृति चिन्ह हैं जिनमें कुछ तस्वीरें भी शामिल हैं। वो पर्यटक जिन्हें भारत के इतिहास में खास रूचि है, उन्हें सादुल संग्रहालय जरुर जाना चाहिए क्योंकि यहां ऐतिहासिक महत्व की बहुत सी वस्तुएं सहेज कर रखी गईं हैं।

श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर (Laxmi Nath Temple) – राजस्थान के बीकानेर का श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर यहां के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित मंदिर हैं। राव बीकाजी ने 1485 में इसी लक्ष्मीनाथ मन्दिर से, बीकानेर के प्रथम किले की नींव रखी जिसका प्रवेशोत्सव 1488 वैशाख सुदी 2, शनिवार को मनाया गया। इस संबंध में एक लोक-दोहा बहुप्रचलित है –
      ‘पन्द्रह सौ पैंतालवे, सुद बैसाख सुमेर, थावर बीज थरपियो, बीका बीकानेर ||”
यहां के सबसे लोकप्रिय त्यौहार निर्जला एकादशी, जन्माष्टमी, गीता जयंती, दिवाली और रामनवमी हैं। इस मंदिर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण बीकानेर आने वाले लोग इस मंदिर में आने का मौका नहीं चूकते हैं।

रामपुरिया हवेली (Rampuria Haveli) – बीकानेर शहर में अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाने वाली रामपुरिया हवेली बीकानेर की शान हैं। रामपुरिया हवेली पुराने बीकानेर की पतली गलियों में स्तिथ एक खुबसूरत हवेली है। जो लगभग सौ साल पहले लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई थी। उस समय के सबसे अमीर उद्योगपतियों में से एक रहे रामपुरिया परिवार का निवास स्थान थी। रामपुरिया हवेली पुराने वास्तुकला और भव्यता का एक उत्कृष्ट मिश्रण है।

भांडासर जैन मंदिर (Bhandasar Jain Mandir) – बीकानेर जंक्शन से 2.5km की दूरी पर, भांडासर जैन मंदिर राजस्थान के बीकानेर शहर में स्थित एक प्राचीन मंदिर है। यह बीकानेर के शीर्ष तीर्थ-स्थानों में से एक है। इसका निर्माण कार्य 1468 को आरम्भ हुआ और 1514 में पूर्ण हुआ। इस मन्दिर का निर्माण भांडाशाह नाम के एक जैन ने करवाया था इसलिए इसे भांडासर जैन मन्दिर कहते है। यह मंदिर पांचवें तीर्थंकर सुमातिनाथ को समर्पित है। ऐसा कहा जाता है की मंदिर के निर्माण में पानी की जगह 40,000 किलो शुद्ध देसी घी का इस्तेमाल किया गया था। मंदिर निर्माण के समय इसकी नींव में शुद्ध देसी घी डलवाये जाने और अपनी स्थापत्य कला की वजह से मंदिर जग प्रसिद्ध है।

गंगा सिंह संग्रहालय (Ganga Singh Museum) – बीकानेर जंक्शन रेलवे स्टेशन से 3km की दूरी पर, गंगा सिंह संग्रहालय बीकानेर में स्थित सबसे महत्वपूर्ण संग्रहालयों में से एक है। यह राजस्थान राज्य में सबसे अच्छा संग्रहालय है और बीकानेर के दर्शनीय स्थलों की यात्रा के प्रसिद्ध स्थानों में से एक है। गंगा सिंह संग्रहालय की स्थापना सन् 1937 में महाराजा गंगासिंह ने की थी। यह एक ऐसा संग्रहालय है जिसमें इतिहास, कलाकृति और यहां तक कि मूर्तियों का भी अद्भुत संग्रह है। यहाँ, पर्यटकों को महान प्राचीन हड़प्पा सभ्यता के आर्ट वर्क देखने को मिलेंगे जिससे गुप्त काल और कुषाण युग की याद ताजा हो सकती है। इस संग्रहालय को विभिन्न हिस्सों में विभाजित किया गया है, जिन्हें महाराजा गंगा सिंह मेमोरियल, स्थानीय कला और शिल्प, इतिहास, मूर्तिकला, टेराकोटा और कांसे, शस्त्रागार, लघु चित्र, लोक कला अदि नाम दिए गए हैं।

शिवबाड़ी मंदिर (Shiv Bari Temple) – शिवबाड़ी मंदिर बीकानेर शहर से लगभग 6km दूर स्थित हैं। यह बीकानेर शहर के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। स्थानीय लोग इसे लालेश्वर महादेव के नाम से भी जानते हैं। बीकानेर के इस शिव बाड़ी मंदिर का निर्माण महाराजा डूंगर सिंहजी ने 19वीं सदी में करवाया था। लाल बलुआ पत्थरों से बना शिव बाड़ी मंदिर वास्तुकला का एक शानदार नमूना है। यहाँ का मुख्य आकर्षण यहां भगवान शिव की संगमरमर से बनी प्रतिमा है। और सामने भगवान शिव के साथ रहने वाले पवित्र नंदी की भी कांस्य प्रतिमा है।

देवीकुंड सागर (Devi Kund Sagar) – देवीकुंड सागर राजस्थान के  बीकानेर शहर के पूर्व में 8 km की दूरी पर स्थित है। ये स्मारक असल में एक शाही शमशान घाट है, राज परिवार के सदस्यों का इसी स्थान पर अंतिम संस्कार या यूं कहें कि अंत्योष्टि की जाती है। बीकानेर रियासत के प्रथम तीन चार महाराजाओं को छोड़ सभी राजाओं की अंत्योष्टि इसी स्थान पर की गई, देवी कुण्ड सागर में अंत्योष्टि के स्थान पर महाराजा और उसके परिवार की याद में छतरियों का निर्माण करवाया जाता है। 1571 में जब बीकानेर के 5वे महाराजा राव कल्याणमल जी की मर्त्यु हुई तब उनके पुत्र राव रायसिंह ने यहाँ सबसे पहली छतरी बनवाई थी। और आखरी छतरी महाराजा करणी सिंह जी की 1988 में म्रत्यु पश्चात बनाई गई थी। बीकानेर के देवीकुंड सागर के शमशान घाट को देखने रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं।

कोडमदेश्वर मंदिर (Kodamdesar Bheruji Mandir) – बीकानेर शहर से लगभग 24 km की दुरी पर स्थित है कोडमदेसर भैरुजी मंदिर। यहाँ पर खुले स्‍थान पर भैरुजी की विशाल मुर्ति स्‍थापित है। कोडमदेसर भैरुजी मंदिर के पास ही विशाल पवित्र तालाब है राव बीका जी  ने कोडमदेसर भैरुजी मंदिर का निर्माण करवाया था जोधपुर से आने के तीन वर्ष बाद ही राव बीकाजी ने, कोडमदेसर भैरुजी की स्थापना यहाँ पर की तथा पूजा अर्चना की। प्रारम्भ में यह स्थान बीकानेर की नींव रखने के लिए चुना गया था, परन्‍तु सुरक्षा कारणो से अपने सलाहकारो से सलाह के बाद वर्तमान बीकानेर शहर में राव बीकाजी द्वारा अपने राज्‍य की स्‍थापना की गई।

करणी माता मन्दिर (Karni Mata Temple) –– करणी माता का मन्दिर एक प्रसिद्ध हिन्दू मन्दिर है, जो राजस्थान के बीकानेर जिले से महज 30km दूर स्थित देशनोक में स्थित है। करणी माता को मां जगदम्बा का अवतार माना जाता है। करणी माता का मंदिर जिसे चूहों वाली माता, चूहों वाला मंदिर और मूषक मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ये एक ऐसा मंदिर है, जहां पर 20 हजार चूहे रहते हैं। इस मंदिर में चूहों को बहुत पवित्र माना जाता है और मंदिर में इनके आसानी से आने जाने के लिए खास छेद भी बनाए गए हैं।

गजनेर पैलेस (Gajner Palace) – बीकानेर से 34 km की दूरी पर, गजनेर पैलेस राजस्थान के विभिन्न दर्शनीय स्थलों में सुमार एक लोकप्रिय स्थान हैं, जोकि एक झील के किनारे पर स्थित है। महाराजा गंगा सिंह जी ने इस महल को लाल बलुआ पत्थर से बनवाया गया था। गजनेर पैलेस का उपयोग शिकार और अवकाश बिताने के लिए एक लॉज के रूप में किया जाता था।

गजनेर वन्यजीव अभयारण्य (Gajner Wildlife Sanctuary) – बीकानेर का गजनेर वन्यजीव अभयारण्य बीकानेर शहर से 32km दूर स्थित है। गजनेर वन्यजीव अभयारण्य बीकानेर के सबसे प्रमुख यात्रा आकर्षणों में से एक है। यह वन्यजीव अभयारण्य शहर में सबसे ज्यादा देखे जाने वाली जगहों में से एक है। पहले के समय में गजनेर वन्यजीव अभयारण्य शिकार करने के लिए बीकानेर के महाराजा की पसंदीदा जगह हुआ करता था। गजनेर वन्यजीव अभयारण्य अब जंगली जानवरों के संरक्षण के लिए इस्तेमाल होता है। बीकानेर के गजनेर वन्यजीव अभयारण्य में जंगली जानवरों की कई प्रसिद्ध प्रजातियां हैं जिनमें हिरण, नील गाय, जंगली पक्षी, मृग, काला हिरण, चिंकारा, जंगली सूअर और रेगिस्तान की लोमडि़यां हैं। देश के कई हिस्सों से लोग इस जगह वन्य जीवन की झलक पाने के लिए आते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय ऊंट महोत्सव (International Camel Festival) – बीकानेर में हर साल ऊंट महोत्सव का आयोजन किया जाता है। राजस्थानी लिबाज, रंग में लिपटे ऊंटों को देखने के लिए हर साल इस उत्सव में सैकड़ों की संख्या में लोग देश-विदेश से हिस्सा लेने के लिए आते हैं। ऊंट महोत्सव राजस्थान राज्य के पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित किया जाता हैं। उत्सव का शुभारम्भ खूबसूरत ढंग से सजाए गए ऊंटों की दौड़ के साथ होता है।

कैमल सफारी (Camel Safari) – कैमल सफारी या ऊँट की पीठ पर सवारी करना एक मज़ेदार रोमांचकारी राजस्थानी अनुभव है। बीकानेर शहर में कैमल सफारी पर्यटकों को बहुत ही ज्यादा लुभाती हैं, क्योंकि ऊंट की यह सफारी आपको थार रेगिस्तान की सैर कराती हैं। ऊंट की पीठ पर बैठे हुए अप बीकानेर के रेत के टीलों से गुज़रते हैं और आपको इस क्षेत्र में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के झाड़ियों, पौधों और पक्षियों से परिचित कराया जाता है। कुछ सफारी ऑपरेटर कैंप फायर अर्थात शिविर के पास आग जलाने और लोक संगीत और नृत्य प्रदर्शन का आनंद लेते हुए रेगिस्तान में रात भर रहने की व्यवस्था भी करते हैं। इस क्षेत्र में सर्दियों में अधिक सर्दी और गर्मियों में अधिक गर्मी होती है। यदि आप बीकानेर की यात्रा पर गए हैं और कैमल सफारी नही की तो ये समझियें कि अभी आपकी यात्रा अधूरी हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सफारी होती है क्योंकि इस समय रेत कम गर्म होती हैं। जिससे सफारी करना आसान हो जाती हैं।

बीकानेर घूमने का सबसे अच्छा समय
Best Time To Visit Bikaner –

बीकानेर शहर, रेगिस्तान के निकट होने के कारण, वर्ष भर लगभग सूखा और गर्म रहता है। बीकानेर जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च तक है, जो यहाँ सर्दियों का मौसम है। यह बीकानेर आने के लिए सबसे अच्छा मौसम है। हालांकि मानसून भी बीकानेर आने के लिए एक अच्छा समय है, परंतु संभव हो तो गर्मियों मे बीकानेर आने से बचा जाना चाहिए।

बीकानेर कैसे पहुंचे– How To Reach Bikaner

हवाई मार्गनाल सिविल एयरपोर्ट बीकानेर का सबसे निकटम एयरपोर्ट है जो बीकानेर शहर से 13km दूर है, इसके अलावा जोधपुर एयरपोर्ट बीकानेर से 251km दूर स्थित है। वह से आप बस या टैक्सी की मदद से बीकानेर पहुंच सकते है।

रेलमार्ग – राजस्थान का बीकानेर जंक्शन और लालगढ़ रेलवे स्टेशन के बीच की दूरी लगभग 6 किलोमीटर हैं। यह दोनों स्टेशन बीकानेर को भारत के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, पंजाब, जोधपुर, हैदराबाद, मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद और गुवाहाटी से जोड़ते हैं।

सडक मार्ग – बीकानेर भारत के प्रमुख बड़े नगरों को जैसे दिल्ली, आगरा, जोधपुर, अजमेर, अहमदाबाद, जयपुर,  कोटा और उदयपुर से नियमित रूप से चलने वाली बसों के माध्यम से जुड़ा हुआ हैं। आप राज्य परिवहन की बसे या अपने निजी साधन से बीकानेर पहुंच सकते हैं।

 

 

 

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