तनोट माता मंदिर – पाकिस्तान ने यहां गिराए हजारों बम, लेकिन एक भी नहीं फटा

तनोट माता का मंदिर, जैसलमेर के थार रेगिस्तान में 120 km दूरी पर भारत और पााकिस्तान के बार्डर के पास तनोट गांव में स्थित हैं। यहां से पाकिस्तान बॉर्डर मात्र 20 km दूर है। यहां देवी के दर्शन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और वही पुण्य मिलता है जो माता हिंगलाज मंदिर{बलूचिस्तान, पाकिस्तान} में दर्शन से मिलता है। चारण कुल में जन्मी देवी आवड़ को तनोट माता के नाम से जाना जाता है। तनोट माता को हिंगलाज माँ का ही एक रूप कहा जाता है। हिंगलाज माता जो वर्तमान में बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में ,स्थापित है।

नवरात्रि के मौके पर तनोट मंदिर में मेला लगता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शनार्थ पहुंचते है और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं। तनोट माता बीएसएफ जवानों और स्थानीय लोगों की आराध्य देवी हैं।

मंदिर का इतिहास

मंदिर के एक पुजारी ने मंदिर के इतिहास के बारे में उल्लेख किया कि बहुत समय पहले एक मामड़िया चारण नाम का एक चारण था, जिनके कोई ‘बेटा-बेटी’ अर्थात कोई संतान नहीं थी, वह संतान प्राप्ति के लिए लगभग सात बार हिंगलाज माता की पूरी तरह से पैदल यात्रा की। एक रात को उस चारण को स्वप्न में आकर माता ने पूछा कि तुम्हें बेटा चाहिए या बेटी , तो चारण ने कहा कि आप ही मेरे घर पर जन्म ले लो।

हिंगलाज माता की कृपा से उस चारण के घर पर सात पुत्रियों और एक पुत्र ने जन्म लिया। पहली संतान के रूप में विक्रम संवत् 808 चैत्र सुदी नवमी तिथि मंगलवार को भगवती श्री आवड़देवी यानी तनोट माता का जन्म हुआ था।माता की 6 बहनें आशी, सेसी, गेहली, होल, रूप और लांग थीं। देवी मां ने जन्म के बाद क्षेत्र में बहुत से चमत्कार दिखाए और लोगों का कल्याण किया। तनोटराय स्थान के नाम के कारण  माता तनोटराय नाम से प्रसिद्ध हुईं। तनोट के राजा भाटी तनुराव थे, जिन्होंने वि.सं. 828 में इस मंदिर की प्रतिष्ठा करवाई।

भारत-पाक युद्ध  में दिखाया चमत्कार –

मंदिर के साथ भारत-पाकिस्तान युद्ध की एक किवदंती जुड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि भारत और पाकिस्तान के मध्य जो सितम्बर 1965 को लड़ाई हुई थी, उसमें पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा गिराए गए करीब 3000 बम भी इस मंदिर में खरोंच तक नहीं ला सके। वहीं, मंदिर परिसर में गिरे 450 बम तो फटे ही नहीं। इनमें से कुछ बम आज भी मंदिर में रखे हुए हैं। बीएसएफ जवानों और स्थानीय लोगों का मानना है कि उस युद्ध में तनोट माता की कृपा ने भारत को जीत दिलाई थी। इस कारण बीएसएफ के जवानों और दूसरे श्रद्धालुओं के बीच इस मंदिर की काफी मान्यता है।

ऐसा ही एक चमत्कार 1971 के युद्ध में भी देखने को मिला, 1971 के युद्ध में भी पाकिस्तान की सेना ने तनोटराय माता मंदिर से कुछ ही दूर स्थित लोंगेवाला में फिर हमला किया था, परन्तु 1965 की ही तरह उन्हें फिर से मुंह की खानी पड़ी। उनके टैंक यहां मिट्टी में फंस गए थे, जिन्हें बाद में भारतीय वायु सेना बमबारी करके धवस्त कर दिया था। लोंगेवाला की विजय के बाद मंदिर परिसर में एक विजय स्तंभ का निर्माण किया गया, जहां अब हर वर्ष 16 दिसंबर को सैनिकों कि याद में उत्सव मनाया जाता है। ये स्तंभ भारतीय सेनिकों की वीरता की याद दिलाता है।

पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ने भारत सरकार से मांगी थी दर्शन की अनुमति –

बताया जाता है कि वर्ष 1965 के युद्ध के दौरान माता के चमत्कारों के आगे नतमस्तक पाकिस्तानी ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने भारत सरकार से यहां दर्शन करने की अनुमति देने का अनुरोध किया। करीब ढाई साल की जद्दोजहद के बाद भारत सरकार से अनुमति मिलने पर ब्रिगेडियर खान ने न केवल माता की प्रतिमा के दर्शन किए बल्कि मंदिर में चांदी का एक सुंदर छत्र चढ़ाया। ब्रिगेडियर खान का चढ़ाया हुआ छत्र आज भी इस घटना का गवाह बना हुआ है।

मंदिर की देख-रेख –

लगभग 1200 साल पुराने तनोट माता के मंदिर के महत्व को देखते हुए बीएसएफ ने यहां अपनी चौकी बना रखी है। इतना ही नहीं बल्कि मंदिर का संचालन, साफ सफाई, तीन समय की आरती व देखरेख भी बीएसएफ ही करती है। रोजाना बीएसएफ के जवान ड्यूटी पर निकलने से पहले तनोटराय माता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। कई मौकों पर बीएसएफ के जवान यहां रात्रि भजन कीर्तन का भी आयोजन करते रहते हैं। उनका भरोसा है कि तनोटराय माता के आशीर्वाद से दुश्मन उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता है।

रुमाल बांधकर मांगते हैं मन्नत

तनोट माता को रुमाल वाली देवी के नाम से भी जाना जाता है। माता तनोट के प्रति प्रगाढ़ आस्था रखने वाले भक्त मंदिर में रुमाल बांधकर मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु माता का आभार व्यक्त करने वापिस दर्शनार्थ आते है और रुमाल खोलते है। यह मान्यता भी कई सालों से चल रही है।

तनोट माता मंदिर कैसे पहुंचे 

अगर आप तनोट माता के दर्शन करना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले राजस्थान के जैसलमेर पहुंचना होगा। यहां पहुंचने के लिए देशभर से आवागमन के लिए कई साधन आसानी से मिल जाते हैं। जैसलमेर से करीब 130 किमी दूर तनोट माता मंदिर है। मंदिर पहुंचने के लिए आप जैसलमेर से प्राइवेट कार से जा सकते हैं। इसके अलावा राजस्थान रोडवेज की बस भी तनोट जाती है।

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