Mysterious & Talismanic Fort of Chunar | चुनार का रहस्यमयी और तिलिस्मी किला

चुनार का किला उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के चुनार में स्थित है। जो वाराणसी शहर से लगभग 28km की दूरी पर दक्षिण पश्चिम में स्थित है। यह किला विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा नदी के तट पर है। यह किला लगभग 5000  वर्षों का इतिहास सहेजे हुए है। चुनार का प्राचीन नाम ‘चरणाद्रि’ था। जिस पहाड़ी पर यह किला स्थित है उसकी बनावट मानव के पांव के आकार की है। इसलिए इसे चरणाद्रिगढ़ के नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि इस पर्वत पर कई तपस्वियों ने तप किए। यह किला भगवान बुद्ध के चातुर्मास नैना योगीनी के योग का भी गवाह है। नैना योगीनी के कारण ही इसका एक नाम नैनागढ़ भी है।

यह किला भारत कि ऐतिहासिक और अनमोल धरोहर है। ये शानदार किला 3400 वर्ग क्षेत्र में फैला है। यहाँ दर्शनीय स्थलों में राजा भर्तृहरि की समाधि, प्राचीन कुँआ, सोनवा मंडप, 52 खंभा, वारेन हेस्टिंग्स का बंगला और सूर्य घड़ी शामिल हैं। यहाँ किले की पश्चिमी प्राचीर पर सैलानी करीब 1500 साल पुरानी पत्थर की कला कृतियाँ देख सकते हैं जिनमें भगवान् विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ शामिल हैं। जलवायु की दृष्टि से चुनार को आदर्श स्थान बताया जाता है।

18 अप्रैल सन 1924 को मिर्जापुर के तत्कालीन कलक्टर द्वारा दुर्ग पर लगाये एक शिलापत्र पर उत्कीर्ण विवरण के अनुसार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के बाद इस किले पर

  • 1141 से 1191 ई. तक पृथ्वीराज चौहान,
  • 1198 में शहाबुद्दीन गौरी,
  • 1333 से स्वामीराज,
  • 1445 से जौनपुर के मुहम्मदशाह शर्की,
  • 1512 से सिकन्दर शाह लोदी,
  • 1529 से बाबर,
  • 1530 से शेरशाहसूरी
  • 1536 से हुमायूं आदि शासकों का अधिपत्य रहा है।
  • शेरशाह सूरी से हुए युद्ध में हुमायूं ने इसी किले में शरण ली थी।

इस प्रसिद्ध किले का पुनरनिर्माण शेरशाह सूरी द्वारा करवाया गया था। इस किले के चारों ओर ऊंची-ऊंची दीवारें मौजूद है। यहां से सूर्यास्त का नजारा देखना बहुत मनोहारी प्रतीत होता है। कहा जाता है कि एक बार इस किले पर अकबर ने कब्‍जा कर लिया था। उस समय यह किला अवध के नवाबों के अधीन था। इस किले का जिक्र अकबर कालीन इतिहासकार शेख अबुल फजल के आइने अकबरी में भी मिलता है।

यह किला कितना पुराना है उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके निर्माण काल का किसी को पता नहीं है। कोई नहीं जनता कि इस किले का निर्माण किस शासक ने कराया है। इतिहासकार बताते हैं कि महाभारत काल में इस पहाड़ी पर सम्राट काल्यवन का कारागार था ऐसी भी कहानियां हैं जिसमें ये कहा गया है कि विलासिता व भोग के जीवन से विरक्त सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भतृहरि ने यही तप साधना की थी।भर्तृहरि विक्रमादित्य के मनाने पर भी घर नहीं लौटे तो उनकी रक्षार्थ विक्रमादित्य ने यह क़िला बनवा दिया था। भतृहरि गुरु गोरखनाथ के शिष्य थे श्री भतृहरि गुरु गोरखनाथ से ज्ञान लेने के बाद चुनारगढ़ आये और तपस्या करने लगे। उस समय इस स्थान पर घना जंगल था जंगल में हिंसक जंगली जानवर रहते थे इसलिए सम्राट विक्रमादित्य ने योगीराज भतृहरी कि रक्षा के लिये इस स्थान जिर्णोद्धार कराकर एक किले का निर्माण कराया। दुर्ग में आज भी उनकी समाधि बनी हुई है। हालांकि तमाम इतिहासकार इसे मान्यता नहीं देते हैं पर मिर्जापुर गजेटियर में इसका उल्लेख किया गया है।

अंग्रेजों के शासनकाल में सीमा पर स्थित होने के कारण काफी समय तक इसका सैनिक महत्व बना रहा। वारेन हेस्टिंग्ज का यह अत्यंत प्रिय निवास स्थान था। अंग्रेजों ने चुनार का उपयोग अपनी सेनाओं के वृद्ध तथा रोगी सैनिकों को बसाने के लिये किया था। अंग्रेजों का निवासस्थान होने के चिह्न अभी तक कब्रगाह और गिरजाघर के रूप में वर्तमान हैं।

वर्तमान समय में इस किले को अत्यधिक प्रसिद्धि दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक बाबू देवकीनन्दन खत्री द्वारा रचित प्रसिद्ध तिलिस्मी उपन्यास चन्द्रकान्ता के कारण मिली। चन्द्रकान्ता उपन्यास का केन्द्र बिन्दु चुनारगढ़ है। हालांकि चंद्रकांता का सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। इसके बावजूद चुनारगढ़ भारत का सबसे बड़ा तिलिस्मि और रहस्यमयी किला माना जाता है।

किले के ऊपर एक बहुत गहरी बाउली है जिसमें पानी के अन्दर तक सिढियां बनी हैं, इसके दिवारों पर कई तरह के चिन्ह बने हैं। ये चिन्ह प्राचीन लिपि (भाषा) कि तरफ इशारा करते हैं। किले में ऊंचाई पर 52 खंभों पर बना हुआ सोनवा मंडप है। कहा जाता है कि इस मंडप के नीचे रहस्यमयी और तिलिस्मी तहखाना है। बताया जाता है कि तहखाने में कई बंद दरवाजे हैं। इन दरवाजों से किले के भीतर जाने का रास्ता है। इन तहखानों के अंदर कई रहस्य छुपे हैं। कहा जाता है कि इस किले के तहखाने में खजाना छिपा हुआ है। स्थानीय लोगों ने कई बार इसकी खुदाई की भी मांग की है।

वाराणसी के दर्शनीय स्थल –

वाराणसी के अन्य दर्शनीय स्थल –

  • लोलार्क कुंड
  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय
  • जैन मंदिर
  • गोडोवालिया मार्केट
  • जंतर-मंतर
  • भारत माता मंदिर
  • संकट मोचन मंदिर
  • ललिता गौरी मंदिर
  • कालभैरव मंदिर
  • डंडी राज गणेश मंदिर

वाराणसी जाने का अच्छा समय –
Best Time To Visit Varanasi –

अगर आप वाराणसी सिर्फ काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन करने के लिए जाना चाहते हैं तो आप साल के किसी भी महीने में जा सकते हैं। लेकिन यदि आप काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा वाराणसी के अन्य पर्यटन स्थल देखना चाहते हैं तो वाराणसी जाने का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी के बीच होता है। बरसात के समय में गंगा का जलस्तर बढ़ने के कारण घाट और सीढ़ियां डूब जाती हैं जिसके कारण आप वहां का मनमोहक दृश्य नहीं देख पाएंगे। इसके अलावा वाराणसी में मार्च से लेकर सितंबर माह तक गर्मी और उमस भी खूब होती है। इसलिए वाराणसी जाने का उत्तम समय नवंबर से फरवरी के बीच है। नवंबर में हर साल वाराणसी में एक पांच दिवसीय उत्सव गंगा महोत्सव मनाया जाता है, यह उत्सव आने वाले पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है।

चुनार का किला कैसे पहुंचें –
How to reach Chunar Fort –

हवाई मार्ग –यहां जाने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा वाराणसी है, जहां से सड़क मार्ग से चुनार किला पहुंच सकते हैं।

रेलवे मार्ग – मिर्जापुर रेलवे मार्ग से देश के कई प्रमुख स्टेशनों से जुड़ा हुआ है, जहां उतरकर आप चुनार किला देखने पहुंच सकते हैं।

सड़क मार्ग –मिर्जापुर नेशनल हाइवे से कई शहरों से जुड़ा हुआ है। वाराणसी से बसें भी चलती है।

 

 

 

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