मंदार पर्वत जिससे किया गया था समुद्र मंथन

पुराणों में वर्णित मंद्राचल जिसे आज हम मंदार पर्वत के नाम से जानते हैं, धार्मिक दृष्टिकोण से अतिमहत्वपूर्ण पर्वत है। यह पर्वत बिहार और झारखंड के सीमावर्ती बांका जिले के बौंसी में स्थित है। बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर से मंदार पर्वत की दुरी 76 km तथा भागलपुर से 45 km है। समुद्र मंथन में मथानी के तौर पर मंदार पर्वत का उपयोग हुआ था। तब से इस पर्वत का धार्मिक महत्व काफी बढ़ गया है। माना जाता है कि जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तो मंदार पर्वत को मथनी और उस पर वासुकी नाग को लपेट कर रस्सी का काम लिया गया था। पर्वत पर अभी भी धार दार लकीरें दिखती हैं, ये लकीरें किसी भी तरह मानव निर्मित नहीं लगतीं। जन विश्वास है कि समुद्र मंथन के दौरान वासुकी के शरीर की रगड़ से यह निशान बने हैं।

मार्कंडेय पुराण, सहित कई पुराणों में मंदार पर्वत का वर्णन किया गया है। लोक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु सदैव मंदार पर्वत पर निवास करते हैं। यहां की प्राकृतिक मनोरम वादियां भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। जानकारों के अनुसार औरव मुनी के पुत्री समीका का विवाह धौम्य मुनी के पुत्र मंदार से हुआ था। जिसकी वजह से इस पर्वत का नाम मंदार पड़ा था।

पुरातन काल में आज बंगाल की खाड़ी कहा जाने वाला समुद्र, गंगा नदी के बाएं भाग में सवर्त्र फैला था। जैसे-जैसे हिमालय की मिट्टी इसे पाटती गई, वैसे-वैसे समुद्र पूरब की ओर से खिसकता गया। जब टिथिस सागर में मिट्टी भरने की वजह से आज के उत्‍तर प्रदेश और बिहार की भूमि बन गई तब समुद्र कोसी-गंगा संगम के पूरब खिसक गया। गंगा का संगम सकरी गली और राजमहल के पास समुद्र से होने लगा। उस समय संपूर्ण बंगाल समुद्र के गर्भ में था। देवासुरों द्वारा समुद्र मंथन की पौराणिक कहानी संभवत: इसी काल में घटी। पुरातत्व-वेत्ताओं का कहना है कि यह पहाड़ समुद्रतल से एक ठोस शिलापिण्‍ड के रूप में निकला है, जैसे कोई शालिग्राम-पिण्‍ड हो। इस पहाड़ में न तो कहीं कुछ मिलावट है और न ही परतदार है। यह ग्रेनाइट का एक ठोस पिण्‍ड है। एक विशेष प्रकार का पत्‍थर जो निश श्रेणी का है। इसकी उत्‍पत्ति सृष्टि के प्रारंभ में हुई थी। पुरातत्व-वेत्ता ऐसा ही मानते हैं। संपूर्ण मन्‍दार पहाड़ बहुत काल तक जलगर्भ में था।

मंदार पर्वत तीन धर्मों की संगम स्थली भी है। पर्वत तराई में सफा-होड़ धर्म के संस्थापक स्वामी चंदर दास के द्वारा बनवाया गया सफाधर्म मंदिर है तो मध्य में भगवान नरसिंह गुफा है, जिसमें भगवान नरसिंह विराजमान हैं। जबकि पर्वत शिखर पर जैन धर्म के 12 वें तीर्थंकर भगवान वासूपूज्य की निर्वान स्थली है। वहां पर उन्होने तप किया था जिसके वाद तप कल्याणक कहलाए। देश के कोने-कोने से सालों भर जैन मतावलंबी मंदार गिरी आकर अपने तीर्थंकर के चरण स्पर्श करते हैं।

मंदार पर्वत पर पापहरणी तालाब स्थित है। प्रचलित कहानियों के मुताबिक कर्नाटक के एक कुष्ठपीड़ित चोलवंशीय राजा ने मकर संक्रांति के दिन इस तालाब में स्नान किया था, जिसके बाद से उनका कुष्ठ रोग ठीक हुआ। तभी से इसे पापहरणी के रूप में जाना जाता है। इसके पूर्व पापहरणी ‘मनोहर कुंड’ कुंड के नाम से जाना जाता था। पापहरणी तालाब के बीचों बीच लक्ष्मी -विष्णु मंदिर सहित है। हर मकर संक्रांति पर यहां मेले का आयोजन होता है। जहां लाखों की संख्या में आकर पापहरणि सरोवर में मकर स्नान करते हैं। मेले के पहले यात्रा भी होती है, जिसमें लाखों लोग शामिल होते हैं।

पुराणों के अनुसार एक बार भगवान विष्णुजी के कान के मैल से मधु-कैटभ नाम के दो भाईयों का जन्म हुआ। लेकिन धीरे-धीरे इनका उत्पात इतना बढ गया कि सारे देवता इनसे भय खाने लगे। दोनों भाइयों का उत्पात बहुत अधिक बढ़ जाने के बाद अंतत: इन्हें खत्म करने के लिए भगवान विष्णु को इनसे युद्ध करना पड़ा। भगवान विष्णु ने मधुकैटभ राक्षस को पराजित कर उसका वध किया और उसे यह कहकर विशाल मंदार के नीचे दबा दिया कि वह पुनः विश्व को आतंकित न करे। पुराणों के अनुसार यह लड़ाई लगभग दस हजार साल तक चली थी।

मौत से पहले मधु-कैटभ राक्षस ने भगवान विष्णु से यह वादा लिया था कि हर साल मकर संक्रांति के दिन वह उसे दर्शन देने मंदार आया करेंगे। कहते हैं, भगवान विष्णु ने उसे आश्वस्त किया था। यही कारण है कि हर साल मधुसूदन भगवान की प्रतिमा को बौंसी स्थित मंदिर से मंदार पर्वत तक की यात्रा कराई जाती है, जिसमें लाखों लोग शामिल होते हैं।

मंदार पर्वत का इतिहास 

पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक मंदार पर्वत की अधिकांश मूर्तियां उत्तर गुप्त काल की हैं। उत्तर गुप्त काल में मूर्तिकला की काफी सन्नति हुई थी। मंदार के सर्वोच्च शिखर पर एक मंदिर है, जिसमें एक प्रस्तर पर पद चिह्न अंकित है। बताया जाता है कि ये पद चिह्न भगवान विष्णु के हैं। पर जैन धर्मावलंबी इसे प्रसिद्ध तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य के चरण चिह्न बतलाते हैं और पूरे विश्वास और आस्था के साथ दूर-दूर से इनके दर्शन करने आते हैं। एक ही पदचिह्न को दो संप्रदाय के लोग अलग-अलग रूप में मानते हैं लेकिन विवाद कभी नहीं होता है। इस प्रकार यह दो संप्रदाय का संगम भी कहा जा सकता है। इसके अलावा पूरे पर्वत पर यत्र-तत्र अनेक सुंदर मूर्तियां, कुंड एवं गुफाएं हैं हैं, जिनमें सीता कुंड, शंख कुंड, आकाश गंगा के अलावे नरसिंह भगवान गुफा, शुकदेव मुनी गुफा, राम झरोखा के अलावे पर्वत तराई में लखदीपा मंदिर, कामधेनु मंदिर एवं चैतन्य चरण मंदिर शिव, सिंह वाहिनी दुर्गा, महाकाली,  आदि की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। चतुर्भुज विष्णु और भैरव की प्रतिमा अभी भागलपुर संग्रहालय में रखी हुई हैं। फ्रांसिस बुकानन, मार्टिन हंटर और ग्लोब जैसे पाश्चात्य विद्वानों की मूर्तियों भी हैं। पर्वत परिभ्रमण के बाद लोग बौंसी मेला की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। बौंसी स्थित भगवान मधुसूदन के मंदिर में साल भर श्रद्धालु भक्तों का तांता लगा रहता है। मकर संक्रांति के दिन यहां से आकर्षक शोभायात्रा निकलती है।

मंदार पर्वत के अन्य पर्यटन स्थल –
Other Places To Visit In Mandar Parvat –

मंदार पर्वत  कैसे पहुंचे
How To Reach Mandar Hills  –

हवाई मार्ग – मंदार पर्वत का निकटतम हवाई अड्डा पटना (Patna) तथा, राँची (Ranchi) है। पटना/राँची से आप ट्रैन या टैक्सी से मंदार पर्वत पहुंच सकते है। पटना से मंदार पर्वत की दुरी 292 Km तथा राँची से मंदार पर्वत की दुरी 323 Km है।

रेलवे मार्ग मंदार पर्वत का निकटतम रेलवे स्टेशन भागलपुर {Bhagalpur} है। यह हावड़ा पटना दिल्ली लाइन पर है। सभी प्रमुख शहरो से भागलपुर के लिए ट्रेनें चलती हैं। भागलपुर से मंदार पर्वत की दुरी 45 km है। भागलपुर रेल्वे स्टेशन से मंदार पर्वत पहुंचने के लिए ऑटो रिक्शा या टैक्सी मिल जाती है।

सड़क मार्ग देवघर सीधे बड़े शहरो से जुड़ा हुआ है। कोलकाता (373 किमी), पटना (281 किमी), (रांची 250 किमी) तक सड़क से जुड़ा हुआ है। देवघर से धनबाद, बोकारो, जमशेदपुर, रांची और बर्धमान (पश्चिम बंगाल) तक नियमित बसें चलती हैं। देवघर से मंदार पर्वत की दुरी 76 Km है।

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