Bet Dwarka | बेट द्वारका

गुजरात स्थित बेत द्वारका एक छोटा द्वीप है जो कभी ओखा के विकास से पहले इस क्षेत्र का मुख्य बंदरगाह हुआ करता था। यह द्वीप भेंट शंखोदर के नाम से भी जाना जाता है। गोमती द्वारका नगरी से भेंट द्वारका की दूरी करीब 35 किलोमीटर है जिसमें 30 किलोमीटर सड़क मार्ग से ओखा जा सकते हैं। यहां से 5 किलोमीटर नाव द्वारा समुद्री मार्ग पार करके भेंट द्वारका (जिसे गुजराती में बेट द्वारका कहते हैं) पहुंच सकते हैं। ऐसा माना जाता है की यहाँ पर भगवान कृष्ण की जो मूर्ति है उसे भगवान की पत्नी रुकमणीजी ने खुद अपने हाथों से बालू नाम की मिटटी और समुद्र के पानी से बनायीं थी। मान्यता है कि द्वारका यात्रा का पूरा फल तभी मिलता है जब आप भेंट द्वारका की यात्रा करते हैं।

बेट द्वारका में श्री कृष्ण-सुदामा भेंट –

भेंट का मतलब मुलाकात और उपहार भी होता है। इस नगरी का नाम इन्हीं दो बातों के कारण भेंट पड़ा। कहा जाता है की, यह वही स्थल है जहां कृष्ण के प्रिय किन्तु दरिद्र मित्र सुदामा ने उनसे भेंट की थी। बेट द्वारका के मंदिर में कथावाचक रस लेकर इसका बखान करते हैं। उसी अजर अमर भेंट के कारण ही इस स्थल को भेंट द्वारका भी कहा जाता है।

सुदामा-कृष्ण की मित्रता की कहानियां हम सबने बालपन में सुनी तथा पढी हैं। ऐसी कहानियाँ अब भी हमारे लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। आईये एक बार फिर उस कहानी को दुहराते हैं। निर्धन ब्राम्हण-पुत्र सुदामा, अवंतिका या उजैन स्थित संदीपनी आश्रम में बालकृष्ण के सहपाठी थे। कालान्तर में कृष्ण राजा बन गए किन्तु सुदामा निर्धन ही रहे। पत्नी के आग्रह पर वे एक बार कृष्ण से भेंट करने पोरबंदर से द्वारका आये। निर्धनता के कारण वे भेंट स्वरूप केवल मुठ्ठी भर कच्चे चावल ही साथ लाये थे, इन्‍हीं चावलों को खाकर भगवान कृष्‍ण ने अपने मित्र की दरिद्रता दूर कर दी थी। इसलिए यहां आज भी चावल दान करने की परंपरा है। ऐसी मान्‍यता है कि मंदिर में चावल दान देने से भक्‍त कई जन्मों तक गरीब नहीं होते। ऐसी थी कृष्ण सुदामा की मित्रता।

शंखासुर तथा शंखोधार तीर्थ –

गुरु संदीपन के आश्रम में कृष्ण-बलराम और सुदामा ने वेद-पुराण का अध्ययन प्राप्त किया था। कृष्ण को अद्वितीय मान गुरु दक्षिणा में गुरु संदीपन ने कृष्ण से मांगा कि उनका पुत्र प्रभास में जल में डूबकर मर गया था, वे उसे पुनजीर्वित कर दें। बलराम और कृष्ण प्रभास क्षेत्र के समुद्र तट पर गए और सागर जल से कहा कि वे गुरु के पुत्र को लौटा दें। सागर ने उत्तर दिया और बोला कि यहाँ पर कोई बालक नहीं है। सागर ने बताया कि पंचजन नामक सागर दैत्य, जो शंखासुर नाम से भी प्रसिद्ध है, उसने सम्भवतया बालक को चुरा लिया होगा। कृष्ण बालक की खोज में सागर में उतरे, दैत्य को तलाशा और उसे मार डाला। दैत्य का उदर चीरा तो कृष्ण को वहाँ पर कोई बालक नहीं मिला। शंखासुर के शरीर का शंख लेकर कृष्ण और बलराम यम के पास पहुँचे। यमलोक में शंख बजाने पर अनेक गण उत्पन्न हो गए। यमराज ने कृष्ण की माँग पर गुरु पुत्र उन्हें लौटा दिया। वे बालक के साथ गुरु संदीपन के पास गए और गुरु पुत्र के रूप में गुरु को गुरु दक्षिणा दी। किवदंतियों के अनुसार प्रभास क्षेत्र जहां शंखासुर निवास करता था, वही वर्तमान में बेट द्वारका है। बेट घाट तथा द्वारकाधीश मंदिर से 1 km दूर शंख सरोवर नामक एक पवित्र जलाशय है। ऐसा मानना है कि कृष्ण ने शंखासुर का वध वहीं किया था। शंख सरोवर आप आज भी यहाँ देख सकते हैं। शंख सरोवर के किनारे एक छोटा प्राचीन शिव मंदिर भी है।

मीराबाई के जीवन के अंतिम क्षण –

जोधपुर के राठौड़ रतन सिंह की इकलौती पुत्री मीराबाई का मन बचपन से ही कृष्ण-भक्ति में रम गया था। मीराबाई के बालमन से ही कृष्ण की छवि बसी थी इसलिए यौवन से लेकर मृत्यु तक उन्होंने कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना। अपने पति राजकुमार भोजराज की मृत्यु के बाद मीरा को भी उनके पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया परन्तु वे इसके लिए तैयार नहीं हुईं और शनैः शनैः उनका मन संसार से विरक्त हो गया और वे साधु−संतों की संगति में भजन कीर्तन करते हुए अपना समय बिताने लगीं और बृज की तीर्थ यात्रा पर निकल गईं। मीरा बाई वृंदावन में रूप गोस्वामी से मिलीं तथा कुछ वर्ष निवास करने के बाद वे द्वारिका चली गईं। वे अपना अधिकांश समय कृष्ण के मंदिर और साधु−संतों तथा तीर्थ यात्रियों से मिलने में तथा भक्तिपदों की रचना करने में व्यतीत करती थीं। जीवन के अंतिम क्षणों में बेट द्वारका पहुंचकर उन्होंने मंदिर में भोग लगाने की इच्छा व्यक्त की। उनकी ख्याति से अवगत पंडितों ने उन्हें इसकी स्वीकृति दे दी। मंदिर के भीतर वे अपनी भक्ति द्वारा भगवान् कृष्ण में विलीन हो गयी। उनके पवित्र वस्त्र कृष्ण की प्रतिमा को अर्पित किये गए।

यहां भगवान ने भरी नरसी की हुंडी –

मान्‍यता है कि भेंट द्वारका ही वह स्‍थान है जहां भगवान कृष्‍ण ने अपने परम भक्‍त नरसी की हुंडी भरी थी। पहले के जमाने में यह चलन था कि लोग पैदल यात्रा में अधिक धन अपने साथ नहीं ले जाते थे। इस डर से कि कोई चोर न चुरा ले। धन साथ ले जाने की बजाए वे किसी विश्वस्त और प्रसिद्ध व्यक्ति के पास रुपया जमा करके उससे दूसरे शहर के व्यक्ति के नाम हुंडी (धनादेश) लिखवा लेते थे। नरसिंह मेहता की गरीबी का उपहास करने के लिए कुछ शरारती लोगों ने द्वारका जाने वाले तीर्थ यात्रियों से उनके नाम हुंडी लिखवा ली, पर जब यात्री द्वारका पहुंचे तो भगवान कृष्ण ने नरसी की लाज रखने के लिए श्यामल शाह सेठ का रूप धारण किया और नरसी की हुंडी को भर दिया। इस हुंडी का धन तीर्थयात्रियों को दे दिया गया और इस तरह नरसी का यश बढ़ गया।

बेट द्वारका में देखने लायक जगहें – 

श्री द्वारकाधीश मंदिर –  गोमती-द्वारका की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े महल है। ये दुमंजिले और तिमंजले है। पहला और सबसे बड़ा महल श्रीकृष्ण का महल है। यह 500 साल पुराना मंदिर है जिसका निर्माण श्री वल्लभाचार्य ने कराया था। ऐसा माना जाता है की यहाँ पर भगवान कृष्ण की जो मूर्ति है उसे भगवान की पत्नी रुकमणी जी ने खुद अपने हाथों से बालू नाम की मिटटी और समुद्र के पानी से बनाया था। इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल है। उत्तर में रूक्मिणी और राधा के महल है। इन पांचों महलों की सजावट ऐसी है कि आंखें चकाचौंध हो जाती हैं। इन मन्दिरों के किबाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े हैं। भगवान कृष्ण और उनकी मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का सिंगार बड़ा ही कीमती है। हीरे, मोती और सोने के गहने उनको पहनाये गए हैं। सच्ची जरी के कपड़ों से उनको सजाया गया है। सुदामा निर्धनता के कारण वे भेंट स्वरूप केवल मुठ्ठी भर कच्चे चावल ही साथ लाये थे, इन्‍हीं चावलों को खाकर भगवान कृष्‍ण ने अपने मित्र की दरिद्रता दूर कर दी थी। इसलिए यहां आज भी चावल दान करने की परंपरा है।

दांडी हनुमान मन्दिर

बेट-द्वारका के टापू का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मन्दिर है। इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते है। कृष्ण के मुख्य मंदिर से करीब 5 km की दूरी पर ये मंदिर है। हनुमानजी के पास वैसे तो गदा ही होती है लेकिन यहाँ पर उनके हाथों में दांडी है इस लिए इस जगह को दांडी वाले हनुमान से जाना जाता है। ये दुनिया का एक मात्र मंदिर है जहाँ श्री हनुमानजी और उनके पुत्र मकरध्वज की मूर्तियां एक साथ स्थापित है।

श्री चोर्यासी धुना सिद्धपीठ

भेंट द्वारका में भगवान द्वारकाधीश के मंदिर से 7 km की दूरी पर चौरासी धुना नामक एक प्राचीन एवं एतिहासिक तीर्थ स्थल है। ये सिद्धपीठ उदासीन संप्रदाय संभालता है जहा उदासीन संप्रदाय के साधु निवास करते है। चोर्यासी धुना का मतलब 84 साधुओं की समाधी। ऐसा भी माना जाता है की यहाँ दर्शन करने वाले व्यक्ति के 84 लाख योनिओ के पाप धूल जाते है। अतः उनको 84 लाख योनिओ में भटकने की जरूरत नहीं पड़ती। यहाँ आने वाले यात्रियों, भक्तों एवं संतों की निवास, भोजन आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क रूप से चौरासी धुना उदासीन आश्रम के द्वारा की जाती है। जो यात्री भेंट द्वारका दर्शन हेतु जाते हैं वे चौरासी धुना तीर्थ के दर्शन हेतु अवश्य जाते हैं।
उदासी संप्रदाय सिख-साधुओं का एक सम्प्रदाय है जिसकी कुछ शिक्षाएँ सिख पंथ से लीं गयीं हैं। इसके संस्थापक गुरु नानक के पुत्र श्री चन्द (1494–1643) थे। ये लोग सनातन धर्म को मानते हैं तथा पञ्च-प्रकृति (जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश) की पूजा करते हैं।

 डनी पॉइंट

  डनी पॉइंट, दांडी हनुमानजी मंदिर से 1-2km की दूरी पर स्थित है. वहां पर आपको पेदल ही जाना पड़ता है। डनी पॉइंट का वातावरण शुद्ध ओर शान्त है। डनी पॉइंट का नजारा सूर्य अस्त के समय बहुत सुंदर लिखता है। डनी पॉइंट एक ईको-टूरिज्म साइट है यह गुजरात का पहला इको-टूरिज्म साइट है। डनी पॉइंट में डॉल्फिन, कछुए, मछलियों और डगोंग सहित समुद्री जीवन की एक विस्तृत विविधता भी है। पर्यटक बर्ड वॉचिंग, वाटर पोलो, पतंगबाजी, मेडिटेशन और क्रूज़ वेकेशन जैसी कई गतिविधियों में शामिल होते हैं।

द्वारका के अन्य प्रमुख पर्यटन स्थल –

द्वारका के अन्य मंदिर –

द्वारका नगरी के कुछ अन्य मनभावन मंदिर इस प्रकार हैं:-
• स्वामीनारायण मंदिर
• गायत्री देवी मंदिर
• शंकराचार्य मंदिर –इन दिनों यह में खँडहर में परिवर्तित हो गया है, फिर भी आप इस प्राचीन संरचना के अवशेष
देख सकते हैं।
• मीराबाई का मंदिर जो समुद्र नारायण मंदिर परिसर के भीतर स्थित है।

द्वारका घूमने जाने के लिए सबसे अच्छा समय क्या है –
Best Time For Dwarika Dham Yatra –

द्वारका जाने का आदर्श समय नवंबर से फरवरी के आखिरी तक है जब शहर में ठंडा मौसम रहता है। बहरहाल, यदि आप विशेष रूप से द्वारका के भव्य रूप से मनाए जाने वाले जन्माष्टमी महोत्सव के उत्सव में भाग लेना चाहते हैं, तो अगस्त और सितंबर के दौरान शहर की यात्रा करना अच्छा होगा। हालांकि, शहर में आप किसी भी मौसम में यात्रा कर सकते हैं।

द्वारका कैसे पहुंचें –
How To Reach Dwarka –

हवाई मार्ग – द्वारका की यात्रा के लिए निकटतम हवाई अड्डा पोरबंदर (Porbandar) 110 km, जामनगर (Jamnagar) लगभग 127 km तथा, अहमदाबाद (Ahmedabad) 452Km की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के बाद, आप या तो टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या द्वारका पहुंचने के लिए बस ले सकते हैं।

रेलवे मार्ग – द्वारका देश के कई शहरों से रेल नेटवर्क के जरिए कनेक्टेड है। द्वारका रेलवे स्टेशन तक आपको रोज कई ट्रेनें मिल जाएंगी। एक बार द्वारका स्टेशन पहुंचने पर आपके लिए मंदिर जाना आसान है, क्योंकि स्टेशन और मंदिर के बीच की दूरी महज 1 km है। इसके अलावा आप ओखा (okha) 31 km या पोरबंदर (porbandar) 103 km भी जा सकते है। यहां पहुंचने के बाद, आप या तो टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या द्वारका पहुंचने के लिए बस ले सकते हैं।

सड़क मार्ग – द्वारका देश के लगभग सभी बड़े शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। आप न सिर्फ खुद की गाड़ी से वहां पहुंच सकते हैं बल्कि मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको कई बस सर्विस भी मिल जाएंगी, जिसे आप अपनी सुविधा के अनुसार चुन सकते हैं।

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