Rukmini Devi Temple Dwarikadhish | रुक्मिणी देवी मंदिर, द्वारकाधीश

रुक्मिणी देवी मंदिर, द्वारकाधीश मंदिर से 2 km की दूरी पर स्थित है यह मंदिर द्वारका की सीमा में ना होते हुए नगर के बिलकुल बाहर बना हुआ है। माना जाता है की यह मंदिर 2,500 साल पुराना है इसका जीर्णोद्धार 12 वीं शताब्दी में हुआ था । मंदिर की दीवारों पर हाथी, घोड़े, देव और मानव मूर्तियाँ की नक्काशी की गई है। देवी मंदिर में पानी का दान करना काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस मंदिर में आने वाले सभी भक्तों को वह कथा सुनाई जाती है जिस भूल की वजह से श्रीकृष्ण और देवी रुक्मणी को अलग रहना पड़ा था। आइए जानें ऐसी कौन सी भूल हुई थी श्रीकृष्ण और रुक्मणी से जिससे इन्हें अलग होना पड़ा था।

कथा के अनुसार, यादवों के कुलगुरु, ऋषी दुर्वासा का आश्रम द्वारका से कुछ दूरी पर, पिंडारा नामक स्थान में था। एक बार श्रीकृष्ण व रुक्मिणी के मन में उनका अतिथी सत्कार करने की इच्छा उत्पन्न हुई। वे दोनों अपने रथ में सवार होकर ऋषी को निमंत्रण देने उनके आश्रम पहुंचे। दुर्वासा ऋषि ने भगवान कृष्ण व रुक्मिणी का निमंत्रण तो स्वीकार कर लिया लेकिन उन्होंने एक शर्त भी रख दी। दुर्वासा ऋषि ने कहा कि उन्हें ले जाने वाले रथ को न तो घोड़े हांकेंगे ना ही कोई अन्य जानवर। बल्कि रथ को केवल कृष्ण व रुक्मिणी हांकेंगे। कृष्ण व रुक्मिणी ने उनकी मांग सहर्ष स्वीकार कर ली। दुर्वासा ऋषि रथ पर बैठे और भगवान श्रीकृष्ण देवी रुक्मणी के साथ रथ खींचने लगे। रास्ते में देवी रुक्मणी को प्यास लग गई। उनका कंठ सूखने लगा। स्थिति को भांप कर कृष्ण ने शीघ्र अपने दाहिने चरण का अंगूठा धरती पर दबाया। और वहीं गंगा नदी प्रकट हो गयीं। गंगा के जल से रुक्मणी और कृष्ण ने प्यास बुझा ली लेकिन दुर्वासा  ऋषि  से जल की पेशकश नहीं की। कृष्ण जी और देवी रुक्मणी के इस व्यवहार से ऋषि दुर्वासा को क्रोध आ गया। क्रोध में आकर दुर्वासा ऋषि ने भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मणी को अलग रहने का शाप दे दिया। साथ ही यह भी कहा कि जिस जगह गंगा प्रकट हुई है, वह स्थान बंजर हो जाएगा। दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण ही यहां जल का दान किया जाता है। कहते हैं यहां जल दान करने से पतरों को जल की प्राप्ति होती है और उनको मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि रुक्मिणी का मंदिर कृष्ण मंदिर से दूर बनाया गया है। मानो वे अब भी दुर्वास मुनि के श्राप को जी रहे हों।

द्वारका के प्रमुख पर्यटन स्थल –

द्वारका के अन्य मंदिर –

द्वारका नगरी के कुछ अन्य मनभावन मंदिर इस प्रकार हैं:-
• स्वामीनारायण मंदिर
• गायत्री देवी मंदिर
• शंकराचार्य मंदिर –इन दिनों यह में खँडहर में परिवर्तित हो गया है, फिर भी आप इस प्राचीन संरचना के अवशेष
देख सकते हैं।
• मीराबाई का मंदिर जो समुद्र नारायण मंदिर परिसर के भीतर स्थित है।

द्वारका घूमने जाने के लिए सबसे अच्छा समय क्या है –
Best Time For Dwarika Dham Yatra –

द्वारका जाने का आदर्श समय नवंबर से फरवरी के आखिरी तक है जब शहर में ठंडा मौसम रहता है। बहरहाल, यदि आप विशेष रूप से द्वारका के भव्य रूप से मनाए जाने वाले जन्माष्टमी महोत्सव के उत्सव में भाग लेना चाहते हैं, तो अगस्त और सितंबर के दौरान शहर की यात्रा करना अच्छा होगा। हालांकि, शहर में आप किसी भी मौसम में यात्रा कर सकते हैं।

द्वारका कैसे पहुंचें –
How To Reach Dwarka –

हवाई मार्ग – द्वारका की यात्रा के लिए निकटतम हवाई अड्डा पोरबंदर (Porbandar) 110 km, जामनगर (Jamnagar) लगभग 127 km तथा, अहमदाबाद (Ahmedabad) 452Km की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के बाद, आप या तो टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या द्वारका पहुंचने के लिए बस ले सकते हैं।

रेलवे मार्ग – द्वारका देश के कई शहरों से रेल नेटवर्क के जरिए कनेक्टेड है। द्वारका रेलवे स्टेशन तक आपको रोज कई ट्रेनें मिल जाएंगी। एक बार द्वारका स्टेशन पहुंचने पर आपके लिए मंदिर जाना आसान है, क्योंकि स्टेशन और मंदिर के बीच की दूरी महज 1 km है। इसके अलावा आप ओखा (okha) 31 km या पोरबंदर (porbandar) 103 km भी जा सकते है। यहां पहुंचने के बाद, आप या तो टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या द्वारका पहुंचने के लिए बस ले सकते हैं।

सड़क मार्ग – द्वारका देश के लगभग सभी बड़े शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। आप न सिर्फ खुद की गाड़ी से वहां पहुंच सकते हैं बल्कि मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको कई बस सर्विस भी मिल जाएंगी, जिसे आप अपनी सुविधा के अनुसार चुन सकते हैं।

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