Dwarikadhish Temple | द्वारकाधीश मंदिर

भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका जो गुजरात के जामनगर ज़िले में गोमती नदी के तट पर स्थित है। द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान भी कहा जाता है। गुजरात राज्य के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे स्थित द्वारिका 4 धामों में से 1 धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है | द्वारिका 2 हैं- गोमती द्वारिका, बेट द्वारका। गोमती द्वारिका धाम है, बेट द्वारिका पुरी है। गोमती द्वारका वह स्थान है जहां से भगवान श्रीकृष्ण राजकाज किया करते थे और बेट द्वारका वह स्थान है जहां भगवान का निवास स्थान था। बेट द्वारका के लिए समुद्र मार्ग से जाना पड़ता है।

हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है। कई द्वारों का शहर होने के कारण द्वारिका इसका नाम पड़ा। इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है। द्वारका का मुख्य मंदिर द्वारकाधीश मंदिर है जिसे जगत मंदिर (ब्रह्मांड मंदिर) भी कहा जाता है। माना जाता है जब भगवान श्री कृष्ण ने द्वारका को बसाया था तो उसमे, जिस स्थान पर उनका निजी मंदिर यानि ‘हरि गृह’ था उसी स्थान पर द्वारिकाधीश मंदिर स्थित है। भगवान श्री कृष्ण के देहांत के दौरान द्वारिका नगरी समुद्र में डूब गई और यादव कुल नष्ट हो गया। द्वारिका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुल के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में एकमात्र जीवित बच गए थे।

मंदिर का इतिहास –

पुरातात्व विभाग द्वारा बताया जाता है की यह मंदिर करीब 2,200-2500 साल पुराना है। जगत मंदिर के नाम से जाना जाने वाला यह द्वारकाधीश मंदिर 5 मंजिला इमारत तथा 60 स्तंभों द्वारा स्थापित किया गया है। मंदिर का शिखर करीब 38 मीटर ऊँचा है। श्रीकृष्ण का यह मंदिर 108 पवित्र विष्णु मंदिरों में से एक है। मान्यताओं के अऩुसार भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ ने ही द्वारिकाधीश मंदिर का निर्माण किया था। उसके बाद 8वीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर के विस्तार और पुनःनिर्माण में व्यापक योगदान दिया। ऐसा माना जाता है कि यहाँ स्थापित पहली द्वारकाधीश की प्रतिमा की स्थापना, कृष्ण की पहली रानी, रुक्मिणी ने की थी। 1473 में, गुजरात सुल्तान महमूद बेगड़ा ने शहर पर हमला किया और द्वारका के मंदिर को नष्ट कर दिया। द्वारकाधीश मंदिर का पुनर्निर्माण बाद में दुबारा किया गया। 1551 में, जब तुर्क अजीज ने द्वारका पर आक्रमण किया, तो उस मूर्ति को  जिसे रुक्मिणी ने प्रतिष्ठित किया था बेट द्वारका के द्वीप में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्तमान में मंदिर में प्रतिष्ठित द्वारिकाधीश की प्रतिमा, एक ब्रह्मण को सावित्री-वव (कुंवे) में से मिली। ऐसा माना जाता है कि, उस ब्रह्मण को स्वयं द्वारिकाधीश ने स्वप्न में आकर बताया कि सावित्री-वव (कुंवे) में एक और प्रतिमा है, और उस प्रतिमा को एक निर्धारित समय के बाद निकाले के लिए कहा, लेकिन उस ब्रह्मण ने बेताब होकर निर्धारित समय से पहले ही प्रतिमा को सावित्री-वव (कुंवे) से निकल लिया, इसलिए इस प्रतिमा की आँखें पूरी तरह से बन नहीं पायी और आज भी आधी बंद दिखती है। यह द्वारका के भगवान् की वही प्रतिमा है जिसकी वर्तमान में पूजा अर्चना की जाती है। 1861 में, महाराजा गायकवाड़ और अंग्रेजों द्वारा द्वारकाधीश मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था।

द्वारकाधीश मंदिर की ध्वजा –

इस मंदिर का शिखर करीब 38 मीटर ऊँचा है जिसके ऊपर एक बड़ा ध्वज लगा हुआ है जिस पर सूर्य और चन्द्रमा बने हुए हैं जो कि इस बात का संकेत है कि पृथ्वी पर सूर्य और चंद्रमा की मौजूदगी तक श्री कृष्ण का राज्य रहेगा। यह ध्वज 52 गज का होता है। 52 गज के ध्वज को लेकर यह यह कथा है कि द्वारका पर 56 प्रकार के यादवों ने प्रशासन किया। इन सभी के अपने भवन थे। इनमें चार भगवान श्रीकृष्ण, बलराम, अनिरुद्धजी और प्रद्युमनजी देवरूप होने से इनके मंदिर बने हुए हैं और इनके मंदिर के शिखर पर अपने ध्वज लहराते हैं। बाकी 52 प्रशासनिक यादवों के प्रतीक के रूप में यह 52 गज का ध्वज द्वारकाधीशजी के मंदिर पर लहराता है। यह विश्व की सबसे बड़ी ध्वजा है जिसे 10 km की दूरी से भी देखा जा सकता है। यह ध्वजा दिन में तीन बार बदली जाती है। इस अवसर पर ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ यहाँ का माहौल अत्यंत आध्यात्मिक एवं उत्सवी हो जाता है।

द्वारिकाधीश मंदिर की वास्तुकला

वास्तु कला के नजरिये से भी द्वारकाधीश मंदिर को बहुत ही उत्कृष्ट माना जाता है। मंदिर एक परकोटे से घिरा है। मंदिर की चारों दिशाओं में चार द्वार हैं जिनमें उत्तर और दक्षिण में स्थित मोक्ष और स्वर्ग द्वारा आकर्षक हैं। मंदिर 5 मंजिला है। इसके बनाने के ढंग की, निर्माण विशेषज्ञ तक प्रशंसा करते हैं। मंदिर के शिखर पर लहराती धर्मध्वजा को देखकर दूर से ही श्री कृष्ण के भक्त उनके सामने अपना शीष झुका लेते हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर सजावट कृष्ण की जीवन लीलाओं का चित्रण करते हुए की गई है। आंतरिक भाग साधारण और सौम्य है। मंदिर के दो प्रवेश द्वार हैं जो दक्षिण में है उसे स्वर्ग द्वार कहा जाता है तीर्थ यात्री आमतौर पर इसी द्वार के माध्यम से मंदिर में प्रवेश करते हैं। उत्तर की तरफ जो द्वार है उसे मोक्ष द्वार कहा जाता है ।

अंदर मंदिर में द्वारकाधीश जी की श्यामवर्ण चतुर्भुज मूर्ति विराजमान है। भगवान ने हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हैं। बहुमूल्य अलंकरणों तथा सुंदर वेशभूषा से सजी प्रतिमा हर किसी का मन मोह लेती है। यहाँ इन्हें ‘रणछोड़ जी’ भी कहा जाता है।

मंदिर के दक्षिण में भगवान त्रिविक्रम का मंदिर है इसमें राजा बलि तथा सनकादि चारों कुमारों की मूर्तियों के साथ-साथ गरुड़ जी की मूर्ति भी विराजमान है। मंदिर के उत्तर में प्रधुम्न जी की प्रतिमा और उसके पास ही अनिरुद्ध व बलदेव जी की मूर्तियां भी हैं। मंदिर की पूर्व दिशा में दुर्वासा ऋषि का मंदिर है। मंदिर के पूर्वी घेरे के भीतर ही मंदिर का भण्डार है और उसके दक्षिण में जगत गुरु शंकराचार्य का शारदा मठ है। उत्तरी मोक्ष द्वार के निकट कुशेश्वर शिव मंदिर है यहाँ के दर्शन किए बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। मंदिर के दक्षिण में गोमती धारा पर चक्रतीर्थ घाट है। उससे कुछ ही दूरी पर अरब सागर है जहाँ समुद्रनारायण मंदिर स्थित है। इसके समीप ही पंचतीर्थ है। वहाँ पाँच कुओं के जल से स्नान करने की परम्परा है। बहुत से भक्त गोमती में स्नान करके मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं। यहाँ से 56 सीढ़ियाँ चढ़ कर स्वर्ग द्वार से मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं।

मंदिर की समय सारिणी –

द्वारकाधीश मंदिर की दैनिक समय सारिणी
सुबह 6:00 बजे मंदिर खुलता है
सुबह 06:30 बजे मंगल आरती
सुबह 9.45 से 10:00 बजे तक स्नान भोग
सुबह 10:45 बजे आरती दर्शन
सुबह 10:55 बजे ग्वाल दर्शन
सुबह 11:05 से 11:25 बजे तक मध्यान्ह भोग
दोपहर 12:00 से 12:25 बजे तक राज भोग
दोपहर 1:00 बजे मंदिर बंद
शाम 5:00 बजे मंदिर फिर से खुलता है
शाम 5:30 बजे से 5: 45 बजे तक उत्तथपन भोग
शाम 7:30 बजे से 7:45 बजे तक संध्या भोग
शाम 7:45 बजे आरती दर्शन
रात्रि 8:05 बजे से 8:25 बजे तक शायं भोग
रात्रि 8:30 बजे शायं आरती
रात्रि 8:35 बजे से 9:00 बजे तक दर्शन
रात्रि 9:00 बजे से 9:20 बजे तक श्रृंगार दर्शन
रात्रि 9:20 बजे से 9:40 बजे तक स्तुति दर्शन
रात्रि 9:40 बजे मंदिर बंद

द्वारका के प्रमुख पर्यटन स्थल –

द्वारका के अन्य मंदिर –

द्वारका नगरी के कुछ अन्य मनभावन मंदिर इस प्रकार हैं:-
• स्वामीनारायण मंदिर
• गायत्री देवी मंदिर
• शंकराचार्य मंदिर –इन दिनों यह में खँडहर में परिवर्तित हो गया है, फिर भी आप इस प्राचीन संरचना के अवशेष
देख सकते हैं।
• मीराबाई का मंदिर जो समुद्र नारायण मंदिर परिसर के भीतर स्थित है।

द्वारका घूमने जाने के लिए सबसे अच्छा समय क्या है –
Best Time For Dwarika Dham Yatra –

द्वारका जाने का आदर्श समय नवंबर से फरवरी के आखिरी तक है जब शहर में ठंडा मौसम रहता है। बहरहाल, यदि आप विशेष रूप से द्वारका के भव्य रूप से मनाए जाने वाले जन्माष्टमी महोत्सव के उत्सव में भाग लेना चाहते हैं, तो अगस्त और सितंबर के दौरान शहर की यात्रा करना अच्छा होगा। हालांकि, शहर में आप किसी भी मौसम में यात्रा कर सकते हैं।

द्वारका कैसे पहुंचें –
How To Reach Dwarka –

हवाई मार्ग – द्वारका की यात्रा के लिए निकटतम हवाई अड्डा पोरबंदर (Porbandar) 110 km, जामनगर (Jamnagar) लगभग 127 km तथा, अहमदाबाद (Ahmedabad) 452Km की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के बाद, आप या तो टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या द्वारका पहुंचने के लिए बस ले सकते हैं।

रेलवे मार्ग – द्वारका देश के कई शहरों से रेल नेटवर्क के जरिए कनेक्टेड है। द्वारका रेलवे स्टेशन तक आपको रोज कई ट्रेनें मिल जाएंगी। एक बार द्वारका स्टेशन पहुंचने पर आपके लिए मंदिर जाना आसान है, क्योंकि स्टेशन और मंदिर के बीच की दूरी महज 1 km है। इसके अलावा आप ओखा (okha) 31 km या पोरबंदर (porbandar) 103 km भी जा सकते है। यहां पहुंचने के बाद, आप या तो टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या द्वारका पहुंचने के लिए बस ले सकते हैं।

सड़क मार्ग – द्वारका देश के लगभग सभी बड़े शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। आप न सिर्फ खुद की गाड़ी से वहां पहुंच सकते हैं बल्कि मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको कई बस सर्विस भी मिल जाएंगी, जिसे आप अपनी सुविधा के अनुसार चुन सकते हैं।

2 thoughts on “Dwarikadhish Temple | द्वारकाधीश मंदिर

Leave a Reply