Daulatabad Fort, Aurangabad – History | दौलताबाद किला, औरंगाबाद – इतिहास

दौलताबाद किला महाराष्ट्र के औरंगाबाद से करीब 16km की दूरी पर स्थित है। मध्यकालीन भारत के सबसे ताकतवर किला के रूप में प्रसिद्ध दौलताबाद किले को पहले ‘देवगिरी’ के नाम से जाना जाता था। यादवकाल में निर्मित इस किले को लेकर इतिहासकारों का कहना है कि देवताओं के पर्वतों पर बसे होने के कारण इसका नाम ‘देवगिरी’ पड़ा। देवगिरी वर्तमान में एक छोटा सा गांव है। मुगल शासनकाल के दौरान कुछ समय के लिए दौलताबाद को देश की राजधानी बनाया गया था। उस दौरान पूरे देश का कामकाज दौलताबाद के किले से संचालित होता था।

दौलताबाद किला की बनावट  –
Daulatabad Fort Architecture –

दौलताबाद अपने दुर्जेय पहाड़ी किले के लिए प्रसिद्ध है। 190 मीटर ऊंचाई का यह किला शंकु के आकार का है। क़िले की बाहरी दीवार और क़िले के आधार के बीच दीवारों की तीन मोटी पंक्तियां हैं जिसपर कई बुर्ज बने हुए हैं। प्राचीन देवगिरी नगरी इसी परकोटे के भीतर बसी हुई थी। इस किले की सबसे प्रमुख ध्यान देने वाली बात ये है कि इसमें बहुत से भूमिगत गलियारे और कई सारी खाईयां हैं। ये सभी चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं। इस दुर्ग में एक अंधेरा भूमिगत मार्ग भी है, जिसे ‘अंधेरी’ कहते हैं। इस मार्ग में कहीं-कहीं पर गहरे गड्ढे भी हैं, जो शत्रु को धोखे से गहरी खाई में गिराने के लिए बनाये गये थे।

किले के प्रवेश द्वार पर लोहे की बड़ी अंगीठियां बनी हैं, जिनमें आक्रमणकारियों को बाहर ही रोकने के लिए आग सुलगा कर धुआं किया जाता था। चांद मीनार, चीनी महल और बरादारी इस किले के प्रमुख स्मारक हैं। चांद मीनार की ऊंचाई 63 मीटर है और इसे अलाउद्दीन बहमनी शाह ने 1435 में दौतलाबाद पर विजयी होने के उपलक्ष्य में बनाया था। यह मीनार दक्षिण भारत में मुस्लिम वास्तुकला की सुंदरतम कृतियों में से एक है। मीनार के ठीक पीछे जामा मस्जिद है. इस मस्जिद के पिलर मुख्यतः मंदिर से सटे हुए हैं। इसके पास चीनी महल है जहां गोलकोंडा के अंतिम शासक अब्दुल हसन ताना शाह को औरंगजेब ने 1687 में कैद किया था। इसके आस-पास घुमावदार दुर्ग हैं।

कहा जाता है कि किले को इस तरह से बनाया गया है कि इसे कभी कोई बादशाह अंदर घुसकर ताक़त के बल पर जीत नहीं सका , षड्यंत्रों के द्वारा ही इस पर क़ब्ज़ा किया गया।

दौलताबाद किला का इतिहास
Daulatabad Fort History

अपने निर्माण वर्ष (1187-1318) से लेकर 1762 तक इस किले ने कई शासक देखे. इस किले पर यादव, खिलजी, तुगलक वंश ने शासन किया. मोहम्मद बिन तुगलक ने देवगिरी को अपनी राजधानी बनाकर इसका नाम दौलताबाद कर दिया।

देवगिरी की स्थापना यादव नरेश भिलम्म (प्रथम) ने की थी। यादव नरेश पहले चालुक्य राज्य के अधीन थे। भिलम्म ने 1187 में स्वतंत्र राज्य स्थापित करके देवगिरी में अपनी राजधानी बनाई। उसके पौत्र सिंहन ने प्राय: संपूर्ण पश्चिमी चालुक्य राज्य अपने अधिकार में कर लिया। उसी काल में दो सौ वर्षों तक हिंदू शासकों ने देवगिरि पर शासन किया। देवगिरी के किले पर अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार 1294 में चढ़ाई की थी। इस अभेद किले को जीतने के लिए उसने रसद (दाना-पानी) तक बंद करा दिया था, जिसके बाद यादव नरेश ने हार स्वरूप राजस्व देना स्वीकार किया। कहा जाता है कि राजस्व में मिली अकूत दौलत को लादने के लिए खिलजी के बेड़े में शामिल हाथी-घोड़े और ऊंट कम पड़ गए थे। लेकिन बाद में उन्होंने जब दिल्ली के सुल्तान को राजस्व देना बन्द कर दिया तो 1307, 1310 और 1318 में मलिक कफूर ने फिर देवगिरी पर आक्रमण किया।

1327 में मोहम्मद बिन तुगलक ने देवगिरी को अपनी राजधानी बनाई और इन्होंने ही इसका नाम देवगिरी से दौलताबाद (दौलत से आबाद) रखा। दौलताबाद की सामरिक स्थिति बहुत ही महत्‍वपूर्ण थी। यह उत्तर और दक्षिण भारत के मध्‍य में पड़ता था। यहां से पूरे भारत पर शासन किया जा सकता था। इसी कारणवश बादशाह मुहम्‍मद बिन तुगलक ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। उसने इस नगर में बड़े-बड़े भवन और सड़कें बनवायीं। एक सड़क दौलताबाद से दिल्ली तक बनायी गई। उसने दिल्‍ली की समस्‍त जनता को दौलताबाद चलने का आदेश दिया था। लेकिन वहां की खराब स्थिति, पानी की कमी तथा आम लोगों की तकलीफों के कारण उसे कुछ वर्षों बाद राजधानी पुन: दिल्‍ली लानी पड़ी।

मुगल बादशाह अकबर के समय देवगिरी को मुगलों ने जीत लिया और इसे मुगल साम्राज्य में शामिल कर लिया गया। 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मौत तक इस किले पर मुगल शासन का ही नियंत्रण रहा। 1760 ई. में यह नगर मराठों के अधिकार में आ गया, लेकिन इसका पुराना नाम देवगिरि पुन: प्रचलित न हो सका। आज भी यह दौलताबाद के नाम से ही जाना जाता है।

औरंगाबाद के पर्यटन स्थल –
Places to Visit in Aurangabad –

दौलताबाद किला – कैसे पहुंचें ?
How to Reach Daulatabad Fort ?

हवाई मार्ग – Daulatabad Fort तक पहुँचने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा औरंगाबाद (Aurangabad) है। यहां से Daulatabad Fort की दूरी 22 Km है। औरंगाबाद हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद आप किसी भी बस या टैक्सी की मदद से Daulatabad Fort तक पहुंच सकते हैं।

रेल मार्ग – Daulatabad Fort तक पहुँचने के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन औरंगाबाद रेलवे स्टेशन (15 Km) है। इसके अलावा आपके पास दूसरा विकल्प जलगाँव शहर (177 Km) है।

सड़क मार्ग – Daulatabad Fort तक जाने के लिए औरंगाबाद और जलगाँव दोनों शहरों से अच्छी सड़क कनेक्टिविटी है। अगर रेल या हवाई यात्रा करके यहाँ पहुंचते हैं तो इसके बाद आप सड़क द्वारा Daulatabad Fort तक पहुंच सकते हैं।

 

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