Grishneshwar Jyotirlinga | घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग – कथा, इतिहास और महत्व

शिवलिंग के रूप में भगवान शिव जहां भी विराजमान हुए, वह प्रसिद्ध स्थान तीर्थस्थलों के रूप में जाने जाते हैं। वैसे तो भगवान शिव के अनगिनत शिवलिंग जगह-जगह स्थापित हैं लेकिन इनमें से 12 शिवलिगों को दिव्य ज्योतिर्लिंग का महत्व दिया जाता है। शिव के इन्हीं 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग। हिंदू धर्म में घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग को अंतिम ज्योतिर्लिंग का दर्जा प्राप्त है। महाराष्ट्र में औरंगाबाद  के नजदीक दौलताबाद से 11 km दूर घृष्‍णेश्‍वर महादेव का मंदिर स्थित है। शिर्डी से घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 114 Km है। बाकी 11 ज्योतिर्लिंगों की तरह भगवान शिव के अंतिम ज्योतिर्लिंग घुष्मेश्वर की महिमा अपरमपार है। शिवमहापुराण में भी घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का उल्लेख है। मान्यता है कि घुष्मेश्वर में आकर भगवान शिव के इस स्वरूप के दर्शन से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती हैं।

यह मंदिर अजंता और एलोरा की गुफाओं के निकट स्थित है। यह शिवलिंग, भगवान शिव की अपार भक्त रही घुष्मा की भक्ति का स्वरूप है। उसी के नाम पर ही इस शिवलिंग का नाम घुष्मेश्वर पड़ा था।  शहर के शोर-शराबे से दूर स्थित यह मंदिर शांति एवं सादगी से परिपूर्ण माना जाता है।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का इतिहास –
Grishneshwar Temple History –

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की स्थापना की वास्तविक तिथि ज्ञात नही हैं, लेकिन इस मंदिर के बारे में कहां जाता हैं कि यह मंदिर 13 वीं शताब्दी से भी पहले निर्मित किया गया था। मुगल साम्राज्य के दौरान यह मंदिर बेलूर क्षेत्र में स्थित था, जिसे वर्तमान में एल्लोरा केव्स के रूप में जाना जाता हैं। मंदिर के आसपास के क्षेत्र में 13 वीं और 14 वीं शताब्दी के बीच कुछ विनाशकारी हिंदू-मुस्लिम संघर्ष देखे गए हैं, जिसमे यह मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया था। 16 वीं शताब्दी के दौरान बेलूर के प्रमुख के रूप में छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी भोसले ने इस मंदिर को दोबारा निर्मित करवाया था। हालाकि 16 वीं शताब्दी के बाद मुगल सेना ने घृष्णेश्वर मंदिर पर कई हमले किए। 1680 और 1707 के दौरान हुए मुगल मराठा युद्ध में यह मंदिर फिरसे क्षतिग्रस्त हुआ और अंतिम बार इसका पुनर्निर्माण 18 वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी रानी अहिल्या बाई ने करवाया था।

ज्योतिर्लिंग मंदिर की पौराणिक कथा –

इस ज्योतिर्लिंग के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है जो कि इस प्रकार है। दक्षिण देश में देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नाम का ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ निवास करता था। उनके जीवन का एक ही कष्ट था कि उन्हें कोई संतान नहीं थी। कई प्रयास के बाद भी उनके आंगन में बच्चे की किलकारी नहीं सुनाई पड़ी। तब ब्राह्मण की पत्नी सुदेहा ने छोटी बहन घुष्मा से अपने पति का विवाह करा दिया। घुष्मा भगवान शिव की परम भक्त थी। वह प्रतिदिन 100 पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूरी भक्ति और निष्ठा से पूजा करती थी और फिर एक तालाब में उन्हें विसर्जित करती थी। उस पर भोलेनाथ की महान कृपा थी। समय के साथ उसने एक पुत्र को जन्म दिया। बच्चे के आने से घर में खुशी और उल्लास का माहौल छा गया लेकिन घुष्मा से मिली खुशी उसकी बड़ी बहन सुदेहा को रास न आई और वह उससे जलने लगी। उसका पुत्र सुदेहा को खटकने लगा और एक रात अवसर पाकर सुदेहा ने उसके पुत्र की हत्या करके उसी तालाब में फेंक दिया।

इस घटना से पूरे परिवार में मातम छा गया सब विलाप करने लगे लेकिन शिवभक्त घुष्मा को अपनी भक्ति पर पूर्ण विश्वास था वह बिना किसी दुख विलाप के रोज की तरह उसी तालाब में 100 शिवलिंगों की पूजा कर रही थी। इतने में उसे तालाब से ही अपना पुत्र वापस आता दिखा। यह सब भगवान शिव की महिमा थी कि घुष्मा ने अपने मृत पुत्र को फिर से जीवित पाया। उसी समय स्वयं शिव वहां प्रकट होकर घुष्मा को दर्शन देते हैं। भगवान उसकी बहन को दंड देना चाहते थे लेकिन घुष्मा अपने अच्छे आचरण के कारण भगवान से अपने बहन को क्षमा करने की विनती करती है। अपनी अनन्य भक्त की प्रार्थना पर शिव ने घुष्मा से वरदान मांगने को कहा, तब घुष्मा कहती है कि मैं चाहती हूं कि आप लोक कल्याण के लिए हमेशा के लिए यहां पर बस जाएं। भक्त के नाम को जग में अमर करने के लिए भगवान शिव ने कहा कि मैं अपनी भक्त के नाम से यहां घुष्मेश्वर के नाम से जाना जाऊंगा। तब से यह जगत में भगवान शिव के अंतिम ज्योतिर्लिंग के तौर पर पूजा जाता है। घुश्मेश्वर-ज्योतिर्लिंग की महिमा पुराणों में बहुत विस्तार से वर्णित की गई है। इनका दर्शन लोक-परलोक दोनों के लिए अमोघ फलदाई है।

पूरी होती है यह मनोकामना –

ज्योतिर्लिंग ‘घुष्मेश्वर’ के पास ही एक सरोवर भी है जो शिवालय के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि ज्योतिर्लिंग के साथ जो भक्त इस सरोवर के भी दर्शन करते हैं, भगवान शिव उनकी सभी इच्छाएं पूर्ण करते हैं। शास्त्रों के अनुसार जिस दंपत्ती को संतान सुख नहीं मिल पाता है उन्हें यहां आकर दर्शन करने से संतान की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि यह वही तालाब है जहां पर घुष्मा बनाए गए शिवलिंगों का विसर्जन करती थी और इसी के किनारे उसने अपना पुत्र जीवित मिला था। हर साल यहां सावन माह के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। आम दिनों में भी यहां भारी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के आसपास के प्रमुख पर्यटन और आकर्षण स्थल –
Places To Visit Near Grishneshwar Mandir –

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के दर्शन करने का सबसे अच्छा समय –
Best Time To Visit Grishneshwar Mandir –

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर जाने के लिए सबसे अच्छा समय नवम्बर से फरवरी का माना जाता हैं। सर्दियों का मौसम घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की यात्रा के लिए सबसे अच्छा हैं। हालाकि आप यहां वर्ष में किसी भी समय आ सकते हैं। सावन का महिना भक्तो के लिए बेहद खास होता हैं।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर कैसे पहुंचें –

हवाई मार्ग– घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की यात्रा के लिए निकटतम हवाई अड्डा औरंगाबाद (Aurangabad) है। घुश्मेश्वर से औरंगाबाद की दूरी लगभग 36 Km है। यहाँ से आप स्थानीय साधनों (टैक्सी, बस) की मदद से घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग आसानी से पहुंच जाएंगे।

रेल मार्ग घुश्मेश्वर से सबसे पास का रेलवे स्टेशन औरंगाबाद(36 km) ही है। शिर्डी से घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 114 Km है

सड़क मार्ग– औरंगाबाद से घुश्वेश्वर के लिए आसानी से बसें और निजी साधन मिल जाते हैं।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | सही क्रम और उनसे जुड़ी कुछ खास बातें

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