Baba Baidyanath Dham Jyotirlinga | बाबा बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग – कथा, इतिहास और महत्व

श्री शिव महापुराण के अनुसार 12 ज्योतिर्लिंग की गणना के क्रम मे श्री वैद्यनाथ को नौवाँ ज्योतिर्लिंग बताया गया है। जो झारखंड के देवघर नामक स्थान पर स्थित है। जहाँ पर यह मन्दिर स्थित है उस स्थान को “देवघर” अर्थात देवताओं का घर कहते हैं। बैद्यनाथ स्थित होने के कारण इस स्‍थान को देवघर नाम मिला है। यह स्थान माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि यहाँ पर आने वालों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस कारण इस लिंग को “कामना लिंग” भी कहा जाता हैं। इस स्थान के अनेक नाम प्रचलित हैं। जैसे हरितकी वन, चिताभूमि, रणखंड, रावणेश्वर कानन, हृदयपीठ।

इस ज्योतिर्लिंग के स्थान विवादास्पद है। पहला देवघर झारखण्ड, दूसरा परली महाराष्ट्र

पुराणों में ‘परल्यां वैद्यनाथं च’ ऐसा उल्लेख मिलता है, जिसके आधार पर कुछ लोग वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का स्थान ‘परलीग्राम’ को बताते हैं। ‘परलीग्राम’ निज़ाम हैदराबाद क्षेत्र के अंतर्गत पड़ता है। यहाँ का मन्दिर अत्यन्त पुराना है, जिसका जीर्णोद्धार रानी अहिल्याबाई ने कराया था। यह मन्दिर एक पहाड़ी के ऊपर निर्मित है। पहाड़ी से नीचे एक छोटी नदी भी बहती है तथा एक छोटा-सा शिवकुण्ड भी है। पहाड़ी के ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। लोगों की मान्यता है कि परली ग्राम के पास स्थित वैद्यनाथ ही वास्तविक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग है।

लेकिन शिव पुराण के अनुसार, झारखण्ड प्रान्त के जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप स्थित देवघर का श्री वैद्यनाथ शिवलिंग ही वास्तविक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग है–

वैद्यनाथावतारो हि नवमस्तत्र कीर्तित:।
आविर्भूतो रावणार्थं बहुलीलाकर: प्रभु:।।
तदानयनरूपं हि व्याजं कृत्वा महेश्वर:।
ज्योतिर्लिंगस्वरूपेण चिताभूमौ प्रतिष्ठित:।।
वैद्यनाथेश्वरो नाम्ना प्रसिद्धोऽभूज्जगत्त्रये।
दर्शनात्पूजनाद्भभक्या भुक्तिमुक्तिप्रद: स हि।।

श्री शिव महापुराण के उपर्युक्त 12 ज्योतिर्लिंग की गणना के क्रम मे श्री वैद्यनाथ को नौवाँ ज्योतिर्लिंग बताया गया है। स्थान का संकेत करते हुए लिखा गया है कि ‘चिताभूमौ प्रतिष्ठित:’। इसके अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी ‘वैद्यनाथं चिताभूमौ’ ऐसा लिखा गया है। ‘चिताभूमौ’ शब्द का विश्लेषण करने पर परली के वैद्यनाथ 12 ज्योतिर्लिंगों में नहीं आते हैं, इसलिए उन्हें वास्तविक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मानना उचित नहीं है। सन्थाल परगना जनपद के जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप देवघर पर स्थित स्थान को ‘चिताभूमि’ कहा गया है। जिस समय भगवान शंकर माता  सती के शव को अपने कन्धे पर रखकर इधर-उधर उन्मत्त की तरह घूम रहे थे, उसी समय इस स्थान पर सती का हृत्पिण्ड अर्थात हृदय भाग गलकर गिर गया था। भगवान शंकर ने सती के उस हृत्पिण्ड का दाह-संस्कार उक्त स्थान पर किया था, जिसके कारण इसका नाम ‘चिताभूमि’ पड़ गया। श्री शिव पुराण में एक निम्नलिखित श्लोक भी आता है, जिससे वैद्यनाथ का उक्त चिताभूमि में स्थान माना जाता है।

बाबा बैद्यनाथ धाम की विशेषता – 

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके शीर्ष पर त्रिशूल नहीं, ‘पंचशूल’ है, जिसे सुरक्षा कवच माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि भगवान शंकर ने अपने प्रिय शिष्य शुक्राचार्य को पंचवक्त्रम निर्माण की विधि बताई थी, जिनसे फिर लंकापति रावण ने इस विद्या को सिखा था। कहा जाता है कि रावण ने लंका के चारों कोनों पर पंचशूल का निर्माण करवाया था, जिसे राम को तोड़ना आसान नहीं हो रहा था। बाद में विभिषण द्वारा इस रहस्य की जानकारी भगवान राम को दी गई और तब जाकर अगस्त मुनि ने पंचशूल ध्वस्त करने का विधान बताया था। रावण ने उसी पंचशूल को इस मंदिर पर लगाया था, जिससे इस मंदिर को कोई क्षति नही पहुंचा सके। सभी 12 ज्योतिर्लिंग  के मंदिरों के शीर्ष पर ‘त्रिशूल’ है, परंतु बाबा बैद्यनाथ के मंदिर में ही पंचशूल स्थापित है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा कवच के कारण ही इस मंदिर पर आज तक किसी भी प्राकृतिक आपदा का असर नहीं हुआ है।

बाबा बैद्यनाथ धाम की पौराणिक कथा 

राक्षसराज रावण कैलास पर्वत पर भक्तिभाव पूर्वक भगवान शिव की आराधना कर रहा था। बहुत दिनों तक आराधना करने पर भी जब भगवान शिव उस पर प्रसन्न नहीं हुए, तब वह पुन: दूसरी विधि से तप-साधना करने लगा।उसने अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-त्यों कर दिये और उससे वरदान माँगने को कहा। रावण ने शिव जी से सबसे ज्यादा बलशाली होने का वर मांगा। भगवान ने राक्षसराज रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम बल और पराक्रम प्रदान किया। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद ग्रहण करने के बाद नतमस्तक होकर विनम्रभाव से उसने हाथ जोड़कर कहा– ‘देवेश्वर! आप मुझ पर प्रसन्न है। मैं आपकी शरण में आया हूँ और आपको अपने साथ लंका में ले जाना चाहता हूँ। आप मेरा मनोरथ सिद्ध कीजिए।’ इस प्रकार रावण के कथन को सुनकर भगवान शंकर असमंजस की स्थिति में पड़ गये। उन्होंने उपस्थित धर्मसंकट को टालने के लिए अनमने होकर कहा– ‘राक्षसराज! तुम मेरे इस उत्तम लिंग को भक्तिभावपूर्वक अपनी राजधानी में ले जाओ, किन्तु यह ध्यान रखना- रास्ते में तुम इसे यदि पृथ्वी पर रखोगे, तो यह वहीं अचल हो जाएगा। लेकिन अन्य देवता यह नहीं चाहते थे कि रावण शिवलिंग को अपने साथ लंका ले जाए क्योंकि अगर शिव लिंग वहां पहुंच गया तो रावण के बुरे कामों से दुनिया को खतरा होगा। इसलिए सभी देवताओं ने जल के देवता वरुण से अनुरोध किया कि वे रावण के पेट में प्रवेश करें। रावण के पेट में पानी बढ़ने के वजह से उसे लघुशंका यानि मूत्र विसर्जन करने की इच्छा होने लगी। इसके बाद उसने सोचा की ज्योतिर्लिंग किसी को सौंपकर लघुशंका कर लेता हूं। उस समय एक ग्वाले (बैजू )के रूप में भगवान विष्णु उस स्थान पर प्रकट हुए और रावण ने उसे शिवलिंग सौंप यह कहा कि उसे लघुशंका आ रहा है, लेकिन इस शिवलिंग को वह धरती पर न रखे। जब रावण मूत्र विसर्जन करने गया तो उस ग्वाले(बैजू) ने शिवलिंग को नीचे रख दिया। जब रावण लौट कर आया तो लाख कोशिश के बाद भी शिवलिंग को उठा नहीं पाया. तब उसे भी भगवान की यह लीला समझ में आ गई और वह क्रोधित शिवलिंग पर अपना अंगूठा गढ़ाकर चला गया. उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की. शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की उसी स्थान पर स्थापना कर दी और शिवस्तुति करके वापस स्वर्ग को चले गए. तभी से महादेव ‘कामना लिंग’ के रूप में देवघर में विराजते हैं.

 प्रसिद्ध श्रावण मेला –
Famous Shravan Mela

बैद्यनाथ मंदिर में हर साल जुलाई और अगस्त के महीने में श्रावण मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें देश के सभी भागों से लगभग 7 से 8 मिलियन भक्त इस स्थान पर आते हैं और इस जीवंत उत्सव का हिस्सा बनते हैं। यहां आने वाले भक्त सुल्तानगंज से गंगा का पानी एकत्र करते हैं और फिर नंगे पांव बैद्यनाथ तक जाते हैं जो कि 108 किलोमीटर दूर है।

बाबा बैद्यनाथ धाम यात्रा करने का सबसे अच्छा समय –
Best Time To Visit Baidyanath Temple –

अगर आप देवघर में स्थित बैद्यनाथ धाम मंदिर जाने की योजना बना रहें हैं तो आपको बता दें कि यहां की बाबा धाम यात्रा करने का सबसे अच्छा समय सर्दियों में है। ग्रीष्मकाल के समय यहां बहुत तेज गर्मी पड़ती है और मानसून भी आपकी यात्रा का मजा किरकिरा कर सकता है। इसलिए हम आपको सलाह देना चाहते हैं कि आप इस पवित्र मंदिर की यात्रा अक्टूबर से मार्च तक के महीनों के दौरान करें।

बाबा बैद्यनाथ धाम के प्रांगण में स्थित मंदिर

माँ  पार्वती मंदिर, माँ जगत जननी मंदिर, गणेश मंदिर, ब्रह्मा मंदिर, संध्या मंदिर, कल मनाशा मंदिर, हनुमान मंदिर, माँ  मनशा मंदिर, माँ सरस्वती मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, माँ बागला मंदिर, राम मंदिर, आनंद भैरव मंदिर, माँ गंगा मंदिर, गौरी शंकर मंदिर, माँ तारा मंदिर, माँ काली मंदिर, माँ नारदेश्वर मंदिर, माँ अन्नपूर्णा मंदिर, लक्ष्मी नारायम मंदिर, नीलकंठ मंदिर।

बाबा बैद्यनाथ मंदिर की समय सारणी 

सुबह: 4:00 से दुपहर 3:30 बजे
शाम: 6:00 से 9:00 बजे तक
बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर द्वार सामान्य दिनों में रात 9:00 बजे बंद हो जाता है, लेकिन बाबा मंदिर परिसर का द्वार पूरी रात खुला रहता है। श्रवण मेला और शिवरात्रि, सोमवारी आदि जैसे कई अन्य अवसरों के दौरान दर्शन समय आमतौर पर बढ़ाया जाता है।

बाबा बैद्यनाथ धाम के अन्य पर्यटन स्थल –
Other Places To Visit near Baba Baidyanath Dham –

बाबा बैद्यनाथ धाम कैसे पहुंचे
How To Reach Baba Baidyanath Dham –

हवाई मार्ग – देवघर का निकटतम हवाई अड्डा पटना (Patna) तथा, राँची (Ranchi) है। पटना/राँची से आप ट्रैन या टैक्सी से देवघर पहुंच सकते है। पटना से देवघर की दुरी 245 Km तथा राँची से देवघर की दुरी 252 Km है।

रेलवे मार्ग बैद्यनाथ धाम के निकटतम रेलवे स्टेशन जसीडीह {Jasidih jn (JSME)} है। यह हावड़ा पटना दिल्ली लाइन पर है। सभी प्रमुख शहरो से जसीडीह के लिए ट्रेनें चलती हैं। जसीडीह से देवघर की दुरी 8 किमी है। जसीडीह रेल्वे स्टेशन से देवघर पहुंचने के लिए ऑटो रिक्शा या टैक्सी मिल जाती है।

सड़क मार्ग देवघर सीधे बड़े शहरो से जुड़ा हुआ है। कोलकाता (373 किमी), पटना (281 किमी), (रांची 250 किमी) तक सड़क से जुड़ा हुआ है। देवघर से धनबाद, बोकारो, जमशेदपुर, रांची और बर्धमान (पश्चिम बंगाल) तक नियमित बसें चलती हैं।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | सही क्रम और उनसे जुड़ी कुछ खास बातें

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