Kashi Vishwanath Jyotirlinga | काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग – कथा, इतिहास और महत्व

वाराणसी संसार के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक शहर है। उत्तर प्रदेश राज्य का प्रसिद्ध नगर वाराणसी इसे ‘बनारस’ और ‘काशी’ भी कहते हैं। वाराणसी  हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र नगरों में से एक माना जाता है और इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। इसके अलावा बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना जाता है। वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी, श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है।

काशी की मान्यता- 

काशी की मान्यता है, कि संसार में प्रलय आने पर भी भगवन शिव का यह स्थान बना रहेगा। काशी की रक्षा के लिए भोलेनाथ भगवान इस स्थान को अपने प्रिय त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने के बाद काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक और बारह ज्योतिर्लिंग में से सांतवा ज्योतिर्लिंग है। काशी विश्‍वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्‍ट स्‍थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्‍नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्‍वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्‍वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ हैं। यहि पर सन्त एकनाथ जी ने वारकरी सम्प्रदाय का महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पुरा किया विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में गंगा नदी के तट पर विद्यमान हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग में प्रमुख काशी विश्वनाथ जहां वाम रूप में स्थापित बाबा विश्वनाथ शक्ति की देवी मां भगवती के साथ विराजे हैं। मान्यता है कि पवित्र गंगा में स्नान और काशी विश्वनाथ के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है।श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।विश्वनाथ दरबार में गर्भगृह का शिखर है। इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है।  काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है। बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार इस प्रकार हैं। शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार, निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र की दुनिया में में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और साथ में तंत्र द्वार भी हो।बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है। मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण मुख पर है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की ओर है। इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवेश करता है। इसीलिए सबसे पहले बाबा के अघोर रूप का दर्शन होता है। यहां से प्रवेश करते ही पूर्व कृत पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं। बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं। मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में हर काशी में रहने वालों को पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं। बाबा विश्वनाथ के अघोर दर्शन मात्र से ही जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ रूप में भी विचरण करते हैं। उनकी बारात में भूत, प्रेत, जानवर, देवता, पशु और पक्षी सभी शामिल होते हैं। बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास-

इस मंदिर का 3,500 वर्षो का लिखित इतिहास है। इस मंदिर का निर्माण कब किया गया था इसकी जानकारी तो नहीं है लेकिन इसके इतिहास से पता चलता है कि इस पर कई बार हमले किए गए लेकिन उतनी ही बार इसका निर्माण भी किया गया। बार-बार के हमलों और पुन: निर्मित किये जाने के बाद मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था। यह भी माना जाता है कि महाराजा रंजीतसिंह ने 1853 में  इस मंदिर के शिखर के पुनर्निमाण के लिए एक हजार किलो सोने का दान किया था। 1983 में उत्तरप्रदेश सरकार ने इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया और पूर्व काशी नरेश विभूति सिंह को इसके ट्रस्टी के रूप में नियुक्त किया।

काशी विश्वनाथ मंदिर की पौराणिक कथा-

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिग के संबंध में भी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब भगवान शंकर पार्वती जी से विवाह करने के बाद कैलाश पर्वत रहने लगे तब पार्वती जी इस बात से नाराज रहने लगीं। उन्होंने अपने मन की इच्छा भगवान शिव के सम्मुख रख दी। अपनी प्रिया की यह बात सुनकर भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड़ कर देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में आकर रहने लगे। इस तरह से काशी नगरी में आने के बाद भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिग के रूप में स्थापित हो गए। तभी से काशी नगरी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिग ही भगवान शिव का निवास स्थान बन गया। काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहां निराकार परमेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में श्री काशी विश्वनाथ की 5 आरतियाँ हैं-

  • मंगला आरती: – 3.00 – 4.00 (सुबह)।
  • भोग आरती: – 11.15 से 12.20 (दिन)।
  • संध्या आरती: – 7.00 से 8.15 (शाम)।
  • शृंगार आरती: – 9.00 से 10.15 (रात)।
  • शयन आरती: – 10.30-11.00 (रात्रि)।
  • मंदिर रात 11 बजे बंद कर दिया जाता है।

वाराणसी के दर्शनीय स्थल –

वाराणसी के अन्य दर्शनीय स्थल –

  • लोलार्क कुंड
  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय
  • जैन मंदिर
  • गोडोवालिया मार्केट
  • जंतर-मंतर
  • भारत माता मंदिर
  • संकट मोचन मंदिर
  • ललिता गौरी मंदिर
  • कालभैरव मंदिर
  • डंडी राज गणेश मंदिर

काशी विश्वनाथ मंदिर जाने का अच्छा समय –
Best Time To Visit Kashi Vishwanath Temple-

अगर आप वाराणसी सिर्फ काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन करने के लिए जाना चाहते हैं तो आप साल के किसी भी महीने में जा सकते हैं। लेकिन यदि आप काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा वाराणसी के अन्य पर्यटन स्थल देखना चाहते हैं तो वाराणसी जाने का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी के बीच होता है। बरसात के समय में गंगा का जलस्तर बढ़ने के कारण घाट और सीढ़ियां डूब जाती हैं जिसके कारण आप वहां का मनमोहक दृश्य नहीं देख पाएंगे। इसके अलावा वाराणसी में मार्च से लेकर सितंबर माह तक गर्मी और उमस भी खूब होती है। इसलिए काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन के लिए जाने का उत्तम समय नवंबर से फरवरी के बीच है।

काशी विश्वनाथ मंदिर कैसे पहुंचें –
How to reach Kashi Vishwanath Temple –

हवाई मार्ग – लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट वाराणसी का मुख्य एयरपोर्ट है जो विश्वनाथ मंदिर से 25km दूर बाबतपुर में स्थित है।

रेलवे मार्ग – वाराणसी सिटी स्टेशन मंदिर से केवल 2km दूर है, जबकि वाराणसी जंक्शन लगभग 6km दूर है। मंडुआडीह स्टेशन से विश्वनाथ मंदिर 4km है। वाराणसी के ये सभी स्टेशन भारत के प्रमुख रेलवे स्टेशन से जुड़े हुए हैं, जहां आप ट्रेन से पहुंच सकते हैं। इसके बाद टैक्सी या ऑटो रिक्शा से विश्वनाथ मंदिर पहुंच सकते हैं।

सड़क मार्ग – वाराणसी (राष्ट्रीय राजमार्ग) NH 2 को कलकत्ता से दिल्ली तक, NH 7 से कन्या कुमारी और NH 29 गोरखपुर के साथ जुड़ा हुआ है, जो पूरे देश में सभी प्रमुख सड़कों से जुड़ा हुआ है।

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