Omkareshwar Jyotirlinga | ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग – कथा, इतिहास और महत्व

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से चतुर्थ ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर है। यह मध्य प्रदेश के शिवपुरी में स्थित है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को शिव महापुराण में ‘परमेश्वर लिंग’ कहा गया है। यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश में पवित्र नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। इस स्थान पर नर्मदा के दो धाराओं में विभक्त हो जाने से बीच में एक ॐ के आकार का टापू-सा बन गया है। इस टापू को मान्धाता-पर्वत या शिवपुरी कहते हैं। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ॐकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इसलिए इसे ओंकारेश्वर नाम से पुकारा जाता है।

ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मुख से हुआ, इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ इसके उच्चारण किए बिना नहीं होता है। ओंकारेश्वर अन्य 12 ज्योतिर्लिंगों से अलग है क्योंकि यहां भगवान शिव दो रूपों में विराजमान हैं एक ओंकारेश्वर और दूसरे अमलेश्वर/ममलेश्वर। शिवपुराण के कोटिरुद्रसंहिता के 18 अध्याय में इसका वर्णन मिलता है। दो रूपों में स्थित होने पर भी ज्योतिर्लिंगों की गणना में यह ज्योतिर्लिंग एक ही गिना जाता है।
स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड में श्री ओंकारेश्वर की महिमा का बखान किया गया है-

देवस्थानसमं ह्येतत् मत्प्रसादाद् भविष्यति।
अन्नदानं तप: पूजा तथा प्राणविसर्जनम्।
ये कुर्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासनम्।।
अर्थात् ‘ओंकारेश्वर तीर्थ अलौकिक है। भगवान शंकर की कृपा से यह देवस्थान के समान ही हैं। जो मनुष्य इस तीर्थ में पहुँचकर अन्नदान, तप, पूजा आदि करता है अथवा अपना प्राणोत्सर्ग यानि मृत्यु को प्राप्त होता है, उसे भगवान शिव के लोक में स्थान प्राप्त होता है।’

अमराणां शतैशचैव संवितो हामरेश्वर:
तथैव ऋषिसंघैशच तेन पुण्यतमो महान्।।
अर्थात् ‘महान पुण्यशाली अमरेश्वर (ओंकारेश्वर) तीर्थ हमेशा सैकड़ों देवताओं तथा ऋषि-महर्षि का अत्यन्त पवित्र तीर्थ है।’

ओंकारेश्वर लिंग किसी मनुष्य के द्वारा गढ़ा, तराशा या बनाया हुआ नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। ॐकारेश्वर का निर्माण नर्मदा नदी से स्वतः ही हुआ है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है। प्राय: किसी मन्दिर में लिंग की स्थापना गर्भ गृह के मध्य में की जाती है और उसके ठीक ऊपर शिखर होता है, किन्तु यह ओंकारेश्वर लिंग मन्दिर के गुम्बद के नीचे नहीं है। कुछ लोगों की मान्यता है कि यह पर्वत ही ओंकाररूप है।

मंदिर की इमारत पांच मंजिला है। इसमें प्रथम मंजिल पर महाप्रसादी वाले भाग में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मौजूद है। दूसरी मंजिल में भगवान महाकालेश्वर, तीसरी मंजिल पर भगवान परमेश्वर सिद्धनाथ, चौथी पर भगवान भुनेश्वर तथा पांचवीं मंजिल पर ध्वजेश्वर महादेव विराजमान हैं। इनमें पहली मंजिल को छोड़ शेष चारों मंदिर में भगवान भोलेनाथ मुख्य शिखर के नीचे स्थापित हैं। यहाँ प्रतिदिन अहिल्याबाई होल्कर की तरफ से मिट्टी से निर्मित 18 शिवलिंग तैयार करके नर्मदा नदी में विसर्जित किये गए हैं।

मंदिर का महत्व-

लोगों का मानना है कि भगवान शिव तीनों लोको का भ्रमण करके यहाँ विश्राम करते हैं। तभी रात्रि में यहाँ शिव भगवान जी की शयन आरती की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भक्तगणों के सारे संकट यहाँ दूर हो जाते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि आप चाहे सारे तीर्थ कर लें लेकिन ओंकारेश्वर के दर्शन करे बिना अधूरे हैं। इसीलिए भक्तगण दूर-दूर से यहाँ भारी संख्या में आते हैं। ओंकारेश्वर तीर्थ के साथ नर्मदाजी का भी विशेष महत्व है। मान्यतानुसार जमुनाजी में 15 दिन का स्नान तथा गंगाजी में 7 दिन का स्नान जो फल प्रदान करता है, उतना पुण्यफल नर्मदाजी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

मंदिर का इतिहास-

इस मंदिर में शिव भक्त कुबेर ने तपस्या की थी तथा शिवलिंग की स्थापना की थी. जिसे शिव ने देवताओ का धनपति बनाया था। कुबेर के स्नान के लिए शिवजी ने अपनी जटाओ से कावेरी नदी उत्पन्न की थी। यह नदी कुबेर मंदिर के बाजू से बहकर नर्मदाजी में मिलती है। यही कावेरी ओमकार पर्वत का चक्कर लगते हुए संगम पर वापस नर्मदाजी से मिलती हैं, इसे ही नर्मदा कावेरी का संगम कहते है।

धनतेरस पूजन-

इस मंदिर पर प्रतिवर्ष दिवाली की बारस की रात को ज्वार चढाने का विशेष महत्त्व है इस रात्रि को जागरण होता है तथा धनतेरस की सुबह ४ बजे से अभिषेक पूजन होता हैं इसके पश्चात् कुबेर महालक्ष्मी का महायज्ञ, हवन, (जिसमे कई जोड़े बैठते हैं, धनतेरस की सुबह कुबेर महालक्ष्मी महायज्ञ नर्मदाजी का तट और ओम्कारेश्वर जैसे स्थान पर होना विशेष फलदायी होता हैं) भंडारा होता है लक्ष्मी वृद्धि पेकेट (सिद्धि) वितरण होता है, जिसे घर पर ले जाकर दीपावली की अमावस को विधि अनुसार धन रखने की जगह पर रखना होता हैं, जिससे घर में प्रचुर धन के साथ सुख शांति आती हैं I इस अवसर पर हजारों भक्त दूर दूर से आते है व् कुबेर का भंडार प्राप्त कर प्रचुर धन के साथ सुख शांति पाते हैं I

ओंकारेश्वर परिक्रमा-

ओंकारेश्वर द्वीप के चारों ओर 16 कि.मी. लंबा परिक्रमा पथ है। परिक्रमा पथ हमारे देश के अधिकतर मंदिरों का अभिन्न अंग है। परिक्रमा पथ कभी गर्भगृह की होती है तो कभी सम्पूर्ण पवित्र क्षेत्र की। अधिकांशतः कई छोटे-बड़े मंदिर व आश्रम तथा कई बार कुछ गाँव भी पवित्र क्षेत्र का भाग होते हैं। भक्तगण मंदिर आकर केवल भगवान् के दर्शन ही नहीं करते, अपितु मंदिर की परिक्रमा भी करते हैं।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा-

कथा 1

एक बार नारद जी भ्रमण करते हुए विंध्याचल पर्वत पर पहुंचे। वहां पर्वतराज विंध्याचल ने नारद जी का स्वागत किया और अहंकार भरी बातें करने लगे कि मैं सर्वगुण संपन्न हूँ, मेरे पास सब कुछ है, हर प्रकार की सम्पदा है। नारद जी विंध्याचल की अभिमान युक्त बातें सुनकर, लम्बी सांस खींचकर चुपचाप खड़े रहे। तब विंध्याचल ने नारद जी से पूछा कि आपको मेरे पास कौन सी कमी दिखाई दी। जिसे देखकर आपने लम्बी सांस खींची। तब नारद जी ने कहा कि तुम्हारे पास सब कुछ है किन्तु तुम सुमेरू पर्वत से ऊंचे नहीं हो ।

उस पर्वत का भाग देवताओं के लोकों तक पहुंचा हुआ है और तुम्हारे शिखर का भाग वहां तक कभी नहीं पहुँच पायेगा। ऐसा कह कर नारद जी वहां से चले गए। लेकिन वहां खड़े विंध्याचल को बहुत दुःख हुआ और मन ही मन शोक करने लगा।

तभी उसने शिव भगवान की आराधना करने का निश्चय किया। जहाँ पर साक्षात् ओमकार विद्यमान है, वहां पर उन्होंने शिवलिंग स्थापित किया और लगातार प्रसन्न मन से 6 महीने तक पूजा की। इस प्रकार शिव भगवान जी अतिप्रसन्न हुए और वहां प्रकट हुए। उन्होंने विंध्य से कहा कि मैं तमसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई भी वरदान मांग सकते हो। तब विंध्य ने कहा कि आप सचमुच मुझ से प्रसन्न हैं तो मुझे बुद्धि प्रदान करें जो अपने कार्य को सिद्ध करने वाले हो। तब शिव जी ने उनसे कहा कि मैं तुम्हे वर प्रदान करता हूँ कि तुम जिस प्रकार का कार्य करना चाहते हो वह सिद्ध हो।वर देने के पश्चात वहां कुछ देवता और ऋषि भी आ गए। उन सभी ने भगवान शिव जी की पूजा की और प्रार्थना की कि हे प्रभु ! आप सदा के लिए यहाँ विराजमान हो जाईए।

शिव भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए। लोक कल्याण करने वाले भगवान शिव ने उन लोगों की बात मान ली और वह ओमकार लिंग दो लिंगों में विभक्त हो गया। जो पार्थिव लिंग विंध्य के द्वारा बनाया गया था वह परमेश्वर लिंग के नाम से जाना जाता है और जो भगवान शिव जहाँ स्थापित हुए वह लिंग ओमकार लिंग कहलाता है। परमेश्वर लिंग को अमलेश्वर लिंग भी कहा जाता है और तब से ही ये दोनों शिवलिंग जगत में प्रसिद्ध हुए।

कथा 2 

एक दूसरी कथा भी प्रचलित है। राजा मान्धाता ने इस पर्वत पर घोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन किया था। तपस्या से शिव भगवान जी अत्यंत प्रसन्न हुए और प्रकट हुए। तब राजा मान्धाता ने शिव भगवान को सदा के लिए यहीं विराजमान होने के लिए कहा। तब से शिव जी वहां विराजमान है। इसीलिए इस नगरी को ओंकार – मान्धाता भी कहते हैं। इस क्षेत्र में 68 तीर्थ स्थल हैं और ऐसा कहा जाता है कि यहाँ 33 कोटि  देवी-देवता निवास करते हैं। यहाँ नर्मदा जी में स्नान करने का विशेष महत्त्व है। नर्मदा जी के दर्शन मात्र से ही आपके सारे पाप दूर हो जाते हैं। यहाँ ज्योतिस्वरूप लिंगों सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग हैं

ओंकारेश्वर मंदिर के आस-पास अन्य तीर्थ एवं दर्शनीय स्थल – 

मामलेश्वर मंदिर– ममलेश्वर मंदिर या अमलेश्वर मंदिर अथवा अमरेश्वर मंदिर, ओंकारेश्वर के ज्योतिर्लिंग का आधा भाग है ओंकारेश्वर के दर्शन के बाद श्रद्धालु यहां मामलेश्वर के दर्शन करते हैं। यहां श्रद्धाओं को ज्योतिर्लिंग को छूकर पूजा करने की इजाजत है। यह मंदिर ओंकारेश्वर मंदिर के ठीक विपरीत नर्मदा नदी के किनारे स्थित है। शिवलिंग के पीछे देवी पार्वती की भी प्रतिमा यहां मौजूद है।

मान्धाता महल- मंदिर के पीछे बनी सीड़ियों से पहाड़ी की ओर जाने पर समक्ष एक श्वेत ऊंची भित्त दिखायी पड़ती है। यह ओंकारेश्वर के मान्धाता महल की भित्त है। ८० सीड़ियाँ पार कर आप इस महल के प्रवेशद्वार तक पहुँच सकते हैं। इस महल का एक भाग आम जनता हेतु खुला है।

काजल रानी गुफा – ओंकारेश्वर से लगभग 9 किमी की दूरी पर स्थित काजल रानी गुफा एक शानदार पर्यटन स्थल जहां की यात्रा आपको जरूर करनी चाहिए। इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों और प्रकृति प्रेमियों के लिए यह एक आदर्श स्थान है। यहां आकर आप अपने ज्ञान का विस्तार कर सकते हैं।

सिद्धनाथ मंदिर – ओंकारेश्वर और मामलेश्वर मंदिर के अलावा आप यहां के अन्य पवित्र स्थल सिद्धनाथ मंदिर के दर्शन कर सकते हैं। यह मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए जाना जाता है। इस मंदिर स्थल को बनाने की शैली में ब्राहमिनिक वास्तुकला का प्रभाव दिखता है।

ओंकारेश्वर तीर्थ क्षेत्र में चौबीस अवतार, माता घाट (सेलानी), सीता वाटिका, धावड़ी कुंड, मार्कण्डेय शिला, मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, अन्नपूर्णाश्रम, विज्ञान शाला, बड़े हनुमान, खेड़ापति हनुमान, ओंकार मठ, माता आनंदमयी आश्रम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव, गायत्री माता मंदिर, आड़े हनुमान, माता वैष्णोदेवी मंदिर, चाँद-सूरज दरवाजे, वीरखला, विष्णु मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, सेगाँव के गजानन महाराज का मंदिर, काशी विश्वनाथ, नरसिंह टेकरी, कुबेरेश्वर महादेव, चन्द्रमोलेश्वर महादेव के मंदिर भी दर्शनीय हैं।

ओंकारेश्वर मंदिर समय सारणी –
मंदिर खुलने का समय:
प्रातः काल ५ बजे – मंगला आरती एवं नैवेध्य भोग
प्रातः कल ५:३० बजे – दर्शन प्रारंभ
मध्यान्ह कालीन भोग:
दोपहर १२:२० से १:१० बजे – मध्यान्ह भोग (दर्शन बंद)
दोपहर १:१५ बजे से – पुनः दर्शन प्रारंभ
सायंकालीन दर्शन:
दोपहर ४ बजे से – भगवान् के दर्शन
(जल और बिल्ब पत्र चार बजे के बाद चढ़ा नहीं सकते )
शयन आरती:
रात्रि ८:३० से ९:०० बजे – शयन आरती
रात्रि ९:०० से ९:३५ बजे – भगवान् के शयन दर्शन

ओंकारेश्वर मंदिर कैसे जाये –
How to Reach Omkareshwar Temple –

हवाई मार्ग – ओंकारेश्वर का निकटतम हवाई अड्डा इंदौर (INDORE) है, जो ओंकारेश्वर से लगभग 84 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है।

रेलवे मार्ग- ओंकारेश्वर रेलवे मार्ग से पहुंचने के लिए खंडवा एंव इंदौर पहुंचना पड़ता है। इंदौर और खंडवा भारत के सभी प्रमुख शहरों से रेल सेवा द्वारा जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग- ओंकारेश्वर जाने के लिए खंडवा और इंदौर से मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (एमपीआरटीसी) और कुछ निजी यात्रा कंपनी के बस सेवा उपलब्ध है। ओंकारेश्वर, खंडवा से 73km, इंदौर से 80km, उज्जैन से 133 km, भोपाल से 268km है।

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