Mahakaleshwar Jyotirlinga | महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग – कथा, इतिहास और महत्व

अगर आप भगवान शिव भक्‍तों में से एक हैं तो आपको पता होगा कि भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्‍योतिर्लिंग हैं जो कि पूरे भारत में विराजमान हैं। इसी में से एक है महाकालेश्वर मंदिर जो भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से तीसरा है। यह ज्‍योतिर्लिंग मध्‍यप्रदेश राज्‍य के उज्जैन शहर में बसा हुआ है। कहा जाता है कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सारे पाप समाप्त हो जाते हैं।

भगवान महाकालेश्वर के संबंध में विभिन्न धर्म ग्रंथों में उल्लेख है कि महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से अकाल मृत्यु से मुक्ति व मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
इसलिए भगवान महाकालेश्वर के संबंध में यह भी प्रचलित है-

“अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का।
काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।।”

12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकाल ही एकमात्र सर्वोत्तम शिवलिंग है। कहते हैं कि

“आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्।
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते।।”
अर्थात आकाश में तारक शिवलिंग, पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। इसलिए महाकालेश्वर को पृथ्वी का अधिपति भी माना जाता है अर्थात वे ही संपूर्ण पृथ्वी के एकमात्र राजा हैं। और संपूर्ण पृथ्वी के राजा भगवान महाकाल यहीं से पृथ्वी का भरण-पोषण करते हैं।

दक्षिणमुखी ज्‍योतिर्लिंग-

भगवान शिव का यह अनोखा मंदिर अन्‍य प्रमुख 12 ज्योतिर्लिंगों में एक मात्र दक्षिणमुखी ज्‍योतिर्लिंग है। शास्‍त्रों के अनुसार कहा गया है कि दक्षिण दिशा के स्वामी स्वयं भगवान यमराज हैं। तभी जो भी व्‍यक्‍ति इस मंदिर में आ कर भगवान शिव की सच्‍चे मन से प्राथर्ना करता है, उसे मृत्‍यु उपरांत यमराज दृारा दी जाने वाली यातनाओं से मुक्‍ति मिलती है।

काल के दो अर्थ होते हैं- एक समय और दूसरा मृत्यु। महाकाल को ‘महाकाल’ इसलिए कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहीं से संपूर्ण विश्व का मानक समय निर्धारित होता था इसीलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम ‘महाकालेश्वर’ रखा गया है। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग ही संपूर्ण पृथ्वी का केंद्र बिंदु है। इसलिए इस स्थान को पृथ्वी का नाभिप्रदेश के नाम से भी पुकारा जाता है।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना –

पौराणिक कथाओं के अनुसार उज्जयिनी में राजा चंद्रसेन का राज था। वह भगवान शिव के परम भक्त थे और शिवगुणों में मुख्य मणिभद्र नामक गण राजा चंद्रसेन के मित्र थे। एक बार राजा के मित्र मणिभद्र ने राजा चंद्रसेन को एक चिंतामणि प्रदान की जो की बहुत ही तेजोमय थी। राजा चंद्रसेन ने मणि को अपने गले में धारण कर लिया, लेकिन मणि को धारण करते ही पूरा प्रभामंडल जगमगा उठा और इसके साथ ही दूसरे देशों में भी राजा की यश-कीर्ति बढ़ने लगी। राजा के पर्ति सम्मा और यश देखकर अन्य राजाओं ने मणि को प्राप्त करने के लिए की प्रयास किए, लेकिन मणि राजा की अत्यंत प्रिय थी। इस कारण से राजा ने किसी को मणि नहीं दी। इसलिए राजा द्वारा मणि न देने पर अन्य राजाओं ने आक्रमण कर दिया। उसी समय राजा चंद्रसेन भगवान महाकाल की शरण में जाकर ध्यानमग्न हो गए। जब राजा चंद्रसेन बाबा महाकाल के समाधिस्थ में थे, तो उस समय वहां एक स्त्री (गोपी )अपने छोटे बालक को साथ लेकर दर्शन के लिए आई। बालक की उम्र महज पांच वर्ष थी और गोपी विधवा थी। राजा चंद्रसेन को ध्यानमग्न देखकर बालक भी शिव पूजा करने के लिए प्रेरित हो गया। वह कहीं से पाषाण ले आया और अपने घर में एकांत स्थल में बैठकर भक्तिभाव से शिवलिंग की पूजा करने लगा। कुछ समय बाद वह भक्ति में इतना लीन हो गया की माता के बुलाने पर भी वह नहीं गया। माता के बार बार बुलाने पर भी बालक नहीं गया। क्रोधित माता ने उसी समय बालक को पीटना शुरू कर दिया औऱ पूजा का सारा समान उठा कर फेंक दिया। ध्यान से मुक्त होकर बालक चेतना में आया तो उसे अपनी पूजा को नष्ट देखकर बहुत दुख हुआ। अचानक उसकी व्यथा की गहराई से चमत्कार हुआ। भगवान शिव की कृपा से वहां एक सुंदर मंदिर निर्मित हुआ। मंदिर के मध्य में दिव्य शिवलिंग विराजमान था एवं बालक द्वारा सज्जित पूजा यथावत थी। यह सब देख माता भी आश्चर्यचकित हो गई। जब राजा चंद्रसेन को इस घटना की जानकारी मिली तो वे भी उस शिवभक्त बालक से मिलने पहुंचे। राजा चंद्रसेन के साथ-साथ अन्य राजा भी वहां पहुंचे। सभी राजाओं ने राजा चंद्रसेन से अपने अपराध की क्षमा मांगी और सब मिलकर भगवान महाकाल का पूजन-अर्चन करने लगे। तभी वहां रामभक्तश्री हनुमान जी सामने आए और उन्होंने गोप -बालक को गोद में बैठाकर सभी राजाओं और उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित किया। अर्थात शिव के अतिरिक्त प्राणियों की कोई गति नहीं है। इस गोप बालक ने मात्र शिव पूजा को देखकर ही, बिना किसी मंत्र अथवा विधि-विधान के शिव आराधना कर  मंगल को प्राप्त किया है। यह शिव का परम श्रेष्ठ भक्त समस्त गोपजनों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इसे लोक में यह अखिल अनंत सुखों को प्राप्त करेगा व मृत्योपरांत मोक्ष को प्राप्त होगा। इसी के वंश का आठवां पुरुष महायशस्वी नंद होगा, जिसके पुत्र के रूप में स्वंय नारायण कृष्ण नाम से प्रतिष्ठित होंगे। कहा जाता है भगवान महाकाल तब ही से उज्जयिनी में स्वयं विराजमान है।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाकाल की असीम महिमा का वर्णन मिलता है। महाकाल को वहां का राजा कहा जाता है और उन्हें राजाधिराज देवता भी माना जाता है। महाकाल के दर्शन करने के बाद “जूना महाकाल” के दर्शन जरूर करना चाहिए। कुछ लोगों के अनुसार जब मुगलकाल में इस शिवलिंग को खंडित करने की आशंका बढ़ी तो पुजारियों ने इसे छुपा दिया था और इसकी जगह दूसरा शिवलिंग रखकर उसकी पूजा करने लगे थे। बाद में उन्होंने उस शिवलिंग को वहीं महाकाल के प्रांगण में अन्य जगह स्थापित कर दिया जिसे आज ‘जूना महाकाल’ कहा जाता है। हालांकि कुछ लोगों के अनुसार असली शिवलिंग को क्षरण से बचाने के लिए ऐसा किया गया। वर्तमान में जो महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है, वह 3 खंडों में विभाजित है। निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य खंड में ओंकारेश्वर तथा ऊपरी खंड में श्री नागचन्द्रेश्वर मंदिर स्थित है। नागचन्द्रेश्वर शिवलिंग के दर्शन वर्ष में एक बार नागपंचमी के दिन ही करने दिए जाते हैं। मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुंड है।

उज्जैन का ऐतिहासिक महत्व-

उज्जैन सप्त पुरियों में से एक है। उज्जैन का प्राचीन नाम उज्जयिनी है। क्षिप्रा नदी के तट पर बसा हुआ यह शहर धार्मिक मान्यताओं और विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य के समय उज्जैन भारत की राजधानी थी। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण और भगवान श्री बलराम ने में यहीं पर महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी। यह ज्योतिष विद्या का केन्द्र भी माना जाता है।

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती –

भस्‍म आरती महाकाल का श्रृंगार है और उन्हें जगाने की व‌िध‌ि है। ऐसी मान्यता है क‌ि वर्षों पहले श्मशान से लायी गयी ताजा मुर्दे की भस्म से भूतभावन भगवान महाकाल की भस्‍म आरती होती थी लेक‌िन अब यह परंपरा खत्म हो चुकी है वर्तमान में महाकाल की भस्‍म आरती में कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़‌ियों को जलाकर तैयार क‌िए गए भस्‍म का प्रयोग क‌िया जाता है। इस आरती का एक न‌ियम यह भी है क‌ि इसे मह‌िलाएं नहीं देख सकती हैं। इसल‌िए आरती के दौरान कुछ समय के ल‌िए मह‌िलाओं को घूंघट करना पड़ता है। आरती के दौरान पुजारी एक वस्‍त्र धोती में होते हैं। इस आरती में अन्य वस्‍त्रों को धारण करने का न‌ियम नहीं है। महाकाल की आरती भस्‍म से होने के पीछे ऐसी मान्यता है क‌ि महाकाल श्मशान के साधक हैं और यही इनका श्रृंगार और आभूषण है। महाकाल की पूजा में भस्‍म का व‌िशेष महत्व है और यही इनका सबसे प्रमुख प्रसाद है। ऐसी धारणा है क‌ि श‌िव के ऊपर चढ़े हुए भस्‍म का प्रसाद ग्रहण करने मात्र से रोग दोष से मुक्त‌ि म‌िलती है।

महाकाल मंदिर के आस-पास अन्य तीर्थ एवं दर्शनीय स्थल – 

1. हरिसिद्धि मंदिर- यह देवी सती के इक्यावन शक्ति पीठों में से एक है।

2. कालभैरव मंदिर- उज्जैन स्थित कालभैरव मंदिर एक चमत्कारी मंदिर है, यहां भगवान की मूर्ति को प्रसाद के रूप में मदिरा (शराब) चढ़ाई जाती है।

3. गोपाल मंदिर- उज्जैन शहर के मध्य में स्थित गोपाल मंदिर भगवान कृष्ण का दर्शनीय मंदिर है।

4. मंगलनाथ-  मंगल संबंधी दोषों का नाश करने के लिए यह देश का एक मात्र मंदिर है।

समय सारणी –

चैत्र माह से आश्विन माह तक-

सुबह की पूजा: सुबह 7:00- सुबह 7:30 बजे
मध्याह्न पूजा: सुबह 10:00 – सुबह 10:30 बजे
शाम की पूजा: शाम 5:00 बजे – शाम 5:30 बजे
श्री महाकाल आरती: शाम 7:00 बजे – शाम 7:30 बजे
बंद करने का समय: रात 11:00 बजे

कार्तिक से फाल्गुन माह तक-

सुबह की पूजा: सुबह 7:30 –सुबह 8:00 बजे
मध्याह्न पूजा:सुबह 10:30 – सुबह 11:00 बजे
शाम की पूजा: शाम 5:30 बजे – शाम 6:00 बजे
श्री महाकाल आरती: शाम 7:30 बजे – रात 8:00 बजे
बंद करने का समय: रात 11:00 बजे

महाकालेश्वर मंदिर कैसे पहुंचे –
How to Reach Mahakaleshwar Temple –

हवाई मार्ग- उज्जैन से लगभग 55km की दूरी पर इन्दौर (INDORE) का एयरपोर्ट है। वहां तक हवाई मार्ग से आकर रेल या सड़क मार्ग से महाकाल मंदिर पहुंचा जा सकता है।

रेल मार्ग- देश के लगभग सभी बड़े शहरों से उज्जैन के लिए रेल गाड़ियां चलती है।

सड़क मार्ग- उज्जैन पहुंचने के लिए सड़क मार्ग का भी प्रयोग किया जा सकता है। उज्जैन सीधे इंदौर, सूरत, ग्वालियर, पुणे, मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर, उदयपुर, नासिक, मथुरा सड़क मार्ग से जुड़ा है.

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | सही क्रम और उनसे जुड़ी कुछ खास बातें

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