Somnath Jyotirlinga | सोमनाथ ज्योतिर्लिंग – कितनी बार तोड़ा गया और कैसे फिर बना

गुजरात के पश्चिमी तट पर सौराष्ट्र में वेरावल बंदरगाह के पास प्रभास पाटन में स्थित यह मंदिर इतिहास में उत्थान और पतन का प्रतीक रह चुक है। प्राचीन समय में सोमनाथ मंदिर मुस्लिम सम्राटों और पुर्तगालियों द्धारा कई बार हमला कर तोड़ा गया एवं कई बार हिन्दू शासकों द्धारा इसका निर्माण भी करवाया गया है।

सोमनाथ मंदिर पहली बार किस समय बना इसका कोई एतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस मंदिर के उल्लेखानुसार ईसा के पूर्व यह अस्तित्व में था। फिर भी यह जानकारी जरूर उपलब्ध है की द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण 649 ईस्वी में वैल्लभी के मैत्रिक राजाओं ने किया। पहली बार इस मंदिर को 725 ईस्वी में सिन्ध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनैद ने तुड़वा दिया था। फिर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण करवाया। इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। मंदिर अपनी धन-सम्पदा के लिए बहुत प्रसिद्द था।

अरब यात्री अल-बरूनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन 1024 में कुल 5000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। तब मंदिर की रक्षा के लिए निहत्‍थे हजारों लोग मारे गए थे। ये वे लोग थे, जो पूजा कर रहे थे या मंदिर के अंदर दर्शन लाभ ले रहे थे और जो गांव के लोग मंदिर की रक्षा के लिए निहत्थे ही दौड़ पड़े थे।

महमूद के मंदिर तोड़ने और लूटने के बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। 1093 में सिद्धराज जयसिंह ने भी मंदिर निर्माण में सहयोग दिया। 1168 में विजयेश्वर कुमारपाल और सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी सोमनाथ मंदिर के सौन्दर्यीकरण में योगदान किया था।

सन् 1297 में जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां ने गुजरात पर हमला किया तो उसने सोमनाथ मंदिर को दुबारा तोड़ दिया और सारी धन-संपदा लूटकर ले गया। मंदिर को फिर से हिन्दू राजाओं द्वारा बनवाने और मुस्लिम राजाओं द्वारा उसे तोड़ने का काम जारी रहा। सन् 1395 में गुजरात के सुल्तान मुजफ्‍फरशाह ने मंदिर को फिर से तुड़वाकर सारा चढ़ावा लूट लिया। इसके बाद 1413 में उसके पुत्र अहमद शाह ने भी यही किया।

बाद में मुस्लिम क्रूर बादशाह औरंगजेब के काल में सोमनाथ मंदिर को दो बार तोड़ा गया- पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में। 1665 में मंदिर तुड़वाने के बाद जब औरंगजेब ने देखा कि हिन्दू उस स्थान पर अभी भी पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने वहां एक सैन्य टुकड़ी भेजकर कत्लेआम करवाया। जब भारत का एक बड़ा हिस्सा मराठों के अधिकार में आ गया तब 1783 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई द्वारा मूल मंदिर से कुछ ही दूरी पर पूजा-अर्चना के लिए सोमनाथ महादेव का एक और मंदिर बनवाया गया

भारत की आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने समुद्र का जल लेकर नए मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया। उनके संकल्प के बाद 1950 में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसका पुनर्निर्माण भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने करवाया। 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने मंदिर में ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

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