Somnath Jyotirlinga | सोमनाथ ज्योतिर्लिंग – कथा, इतिहास और महत्व

सोमनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण प्राचीन हिन्दू मंदिर है, जिसकी गिनती 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में होती है। ज्योतिर्लिंग ऊन स्थानों को कहते है, जहा भगवान शिव ने खुद प्रकट होकर अपने भक्तों को वरदान दिया। सोमनाथ मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में प्रभास पाटन के पास स्थित है। पहले यह क्षेत्र प्रभासक्षेत्र के नाम से जाना जाता था। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने करवाया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है।

उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया। यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। इसे अब तक 17 बार नष्ट किया गया और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया। वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और 11 may 1951 को भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने मंदिर में ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

 गुजरात का सोमनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर ऐसी जगह पर स्थित है जहां अंटार्कटिका तक सोमनाथ समुद्र के बीच एक सीधी रेखा में कोई भूमि नहीं है। सोमनाथ मंदिर के प्राचीन इतिहास और इसकी वास्तुकला और प्रसिद्धि के कारण इसे देखने के लिए देश और दुनिया से भारी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं।

ऐसी मान्यता है कि इसी पावन स्थान पर श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे। तब एक शिकारी ने उनके पैर के तलुए के पद्मचिन्ह को हिरण की आंख जानकर धोखे में तीर मारा था जिस कारण कृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुंठ गमन किया। इस स्थान पर बडा ही सुन्दर कृष्ण मंदिर बना हुआ है।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा का पुराणों में इस प्रकार से वर्णन है-

दक्ष प्रजापति की सत्ताइस कन्याएं थीं। उन सभी का विवाह चंद्रदेव के साथ हुआ था। किंतु चंद्रमा का समस्त अनुराग व प्रेम उनमें से केवल एक रोहिणी के प्रति ही रहता था। उनके इस कृत्य से दक्ष प्रजापति की अन्य कन्याएं बहुत अप्रसन्न रहती थीं। उन्होंने अपनी यह व्यथा-कथा अपने पिता को सुनाई। दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्रदेव को अनेक प्रकार से समझाया।

किंतु रोहिणी के वशीभूत उनके हृदय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंततः दक्ष ने कुद्ध होकर उन्हें ‘क्षयग्रस्त’ हो जाने का शाप दे दिया। इस शाप के कारण चंद्रदेव तत्काल क्षयग्रस्त हो गए। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वी पर सुधा-शीतलता वर्षण का उनका सारा कार्य रूक गया। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। चंद्रमा भी बहुत दुखी और चिंतित थे।

उनकी प्रार्थना सुनकर इंद्रादि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण उनके उद्धार के लिए पितामह ब्रह्माजी के पास गए। सारी बातों को सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- ‘चंद्रमा अपने शाप-विमोचन के लिए अन्य देवों के साथ पवित्र प्रभासक्षेत्र में जाकर मृत्युंजय भगवान्‌ शिव की आराधना करें। उनकी कृपा से अवश्य ही इनका शाप नष्ट हो जाएगा और ये रोगमक्त हो जाएंगे।

उनके कथनानुसार चंद्रदेव ने मृत्युंजय भगवान् शिव‌ की आराधना करना आरम्भ किया। उन्होंने घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ बार मृत्युंजय मंत्र का जप किया। इससे प्रसन्न होकर मृत्युंजय-भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वर प्रदान किया। उन्होंने कहा- ‘चंद्रदेव- मेरे वर से तुम्हारा शाप-मोचन तो होगा ही, साथ ही साथ प्रजापति दक्ष के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी।

कृष्णपक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, किंतु पुनः शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जाया करेगी। इस प्रकार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण चंद्रत्व प्राप्त होता रहेगा।’ चंद्रमा को मिलने वाले इस वरदान से सारे लोकों के प्राणी प्रसन्न हो उठे। सुधाकर चन्द्रदेव पुनः दसों दिशाओं में सुधा-वर्षण का कार्य पूर्ववत्‌ करने लगे।

शाप मुक्त होकर चंद्रदेव ने अन्य देवताओं के साथ मिलकर मृत्युंजय भगवान्‌ से प्रार्थना की कि आप माता पार्वतीजी के साथ सदा के लिए प्राणियों के उद्धारार्थ यहाँ निवास करें। भगवान्‌ शिव उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके ज्योतर्लिंग के रूप में माता पार्वतीजी के साथ तभी से यहाँ रहने लगे।

ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के इस प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही भक्तों के सारे दुख-दर्द दूर हो जाते हैं एवं सोमनाथ भगवान की पूजा-आराधना से भक्तो के क्षय अथवा कोढ़ रोग ठीक हो जाते हैं।

समय सारणी –

दर्शन के समय : सुबह 6 बजे से शाम को 9 बजे।

आरती के समय : सुबह 7 बजे, दोपहर को 12 बजे और शाम को 7 बजे।

जय सोमनाथ साउंड एंड लाइट शॉ : शाम को 8 बजे से 9 बजे।

लगभग एक घंटे का शो, टिकट की कीमत 25 रुपये प्रति व्यक्ति और आधा टिकट 15 /- रुपये है। यह शो पौराणिक कहानी और स्थानों के महत्व के बारे में बताता है। यह प्रवासी तीर्थ के बारे में बताता है जहां भगवान कृष्ण अपना नश्वर शरीर छोड़कर स्वर्ग लौट गए।

यह मंदिर, मंदिर के सभी कोनों से विस्तृत सुरक्षा व्यवस्था प्रदान करता है। सभी भक्तों को मुख्य परिसर में प्रवेश करने से पहले सुरक्षा जांच से गुजारा जाता है।

मंदिर के अंदर मोबाइल,कैमरा और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मान्य नहीं।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | सही क्रम और उनसे जुड़ी कुछ खास बातें

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