Guru Govind Singh | गुरु गो‍बिंद सिंह जी – जीवन परिचय

श्री गुरु गो‍बिंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरु हैं। गुरुगोविंद सिंह जी का जन्‍म श्री पटना साहिब में पौष शुक्ल सप्तमी संवत् 1723 विक्रमी यानि 26 दिसम्बर 1666 को हुआ था। गुरु गोविंद सिंह अपने पिता गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी देवी के एक मात्र पुत्र थे। गुरुजी के जन्‍म के समय गुरु तेगबहादुर जी बंगाल में थे। उन्हीं के वचनोंनुसार गुरुजी का नाम गोविंद राय रखा गया। गुरुजी के बचपन के 4 साल पटना में ही गुजरे। गुरुजी के जन्म स्थान घर का नाम “तख़्त श्री पटना हरिमंदर साहिब” के नाम से आज जाना जाता है।

1670 में गुरुजी का परिवार पंजाब वापस लौट आये। उसके बाद मार्च 1672 में वे चक्क ननकी चले गए जो की हिमालय की निचली घाटी में स्तिथ है। वहां उन्होंने अपनी शिक्षा ली। चक्क नानकी Chakk Nanki शहर की स्थापना गुरुजी के पिता तेग बहादुर जी ने किया था जिसे आज आनंदपुर साहिब के नाम से जाना जाता है। उस स्थान को 1665 में उन्होंने बिलासपुर(कहलूर) के शसक से ख़रीदा था।

गुरु गोबिंद सिंह जी का सिखों के दसवें गुरु बनना –

1675 को कश्मीरी पंडितों की फरियाद सुनकर श्री गुरु तेगबहादुर जी ने दिल्ली के चाँदनी चौक में बलिदान दिया।अपनी मृत्यु से पहले ही तेग बहादुर ने गुरु गोबिंद जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। बाद में मार्च 29, 1676 में गोबिंद सिंह 10वें सिख गुरु बने। 10वें गुरु बनने के बाद भी उनकी शिक्षा जारी रही। यमुना नदी के किनारे  पाओंटा नामक स्थान पर एक शिविर में रह कर गुरु गोबिंद जी ने मार्शल आर्ट्स, शिकार, साहित्य और भाषाएँ जैसे संस्कृत, फारसी, मुग़ल, पंजाबी, तथा ब्रज भाषा भी सीखीं। सन 1684 में उन्होंने एक महाकाव्य कविता भी लिखा जिसका नाम है “वर श्री भगौती जी की” Var Sri Bhagauti Ji Ki/Chandi Di Var. यह काव्य हिन्दू माता भगवती/दुर्गा/चंडी और राक्षसों के बिच संघर्ष को दर्शाता है।

गुरु गोबिंद सिंह का परिवार–

 क्र०सं०  पत्नी का नाम   विवाह तिथि  विवाह स्थान   पुत्र का नाम
1. माता जीतो 21 जून 1677 बसंतगढ़ झुजार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह
2. माता सुंदरी 4 अप्रैल 1684 आनन्दपुर अजित सिंह
3. माता साहिब दीवान 5 अप्रैल 1700 आनन्दपुर  कोई संतान नहीं

खालसा पंथ की स्थापना –

गुरु गोबिंद सिंह जी का नेतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया ले कर आया। धर्म एवं समाज की रक्षा हेतु ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना मुगल शासकों के खिलाफ लड़ने के लिए की । इसके बाद गुरुजी ने अपने स्वयंसेवकों से कहा जो स्वयंसेवक अपने गुरु के लिए अपने सर का बलिदान देने के लिए तैयार है, वह खालसा से जुड़े। इस तरह 5 स्वयंसेवक अपनी अपनी इच्छा से खालसा से जुड़ गए। उसके बाद गुरुजी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। गुरुजी ने खालसा पंथ के मूल सिद्धांतों की स्थापना भी की, जिन्हें गुरु गो‍बिंद सिंह जी के ‘5 ककार’ या ‘5 कक्के’ भी कहा जाता है। खालसा सिखों पांच प्रतीक इस प्रकार है –

  1. कंघा: एक लकड़ी की कंघी, जो कि साफ-सफाई एवं स्वच्छता का प्रतीक मानी जाती है।
  2. कड़ा: हाथ में एक धातु का कंगन पहनना।
  3. कचेरा: कपास का कच्छा अर्थात घुटने तक आने वाले अंतर्वस्त्र
  4. केश: जिसे सभी गुरु और ऋषि मुनि धारण करते आए हैं अर्थात बपतिस्मा वाले सच्चे सिखों को कभी अपने सिर के बाल नहीं काटने चाहिए।
  5. कृपाण: एक कटी हुई घुमावदार तलवार।

परिवार के लोगों की मृत्यु–

सन 1704 में गुरु गोविंद सिंह और वजीर खान के नेतृत्व वाले 10 लाख मुग़ल सैनिकों के बीच पंजाब के चमकौर में युद्ध हुआ। चमकौर के इस युद्ध में गुरु गोबिंद सिंह की सेना में केवल उनके दो बड़े साहिबजादे अजीत सिंह एवं साहिबजादे जुझार सिंह और 40 अन्य सिंह थे। इन 43 लोगों ने मिलकर ही वजीर खां की आधी से ज्यादा सेना का विनाश कर दिया था। वजीर खान गुरु गोविंद सिंह को पकड़ने में असफल रहा, लेकिन इस युद्ध में गुरुजी के दो पुत्रों साहिबज़ादा अजीत सिंह साहिबज़ादा जुझार सिंह और 40 सिंह भी शहीद हो गए।

इस युद्ध के बाद दो और पुत्रों को यानि साहिबज़ादा फतेह सिंह और साहिबज़ादा जोरावर सिंह को वज़ीर खान  नें दीवार में ज़िंदा चुनवा दिया। इस घटना के समयकाल में ही उनकी माता गुजरी देवी जी का भी स्वर्गवास हो गया

जब ये बात गुरूजी को पता चली तो उन्होंने औरंगजेब को जफरनामा (जीत की चिट्टी) लिखा- जिसमें  गुरूजी ने चमकौर युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा –

” चिड़ियों से मै बाज लडाऊ गीदड़ों को मैं शेर बनाऊ. सवा लाख से एक लडाऊ तभी गोबिंद सिंह नाम कहउँ,”
और लिखा औरंगजेब तेरा साम्राज्य खत्म करने के लिए खालसा तैयार हो गए हैं। उन्होंने 8 मई 1705 में “मुक्तसर” नामक जगह पर मुगलों से बहुत भयानक युद्ध लड़ी और जीत हासिल की।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद आपने बहादुरशाह को बादशाह बनाने में मदद की। गुरुजी व बहादुरशाह के संबंध अत्यंत मधुर थे। इन संबंधों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खाँ घबरा गया। अतः उसने दो पठान गुरुजी के पीछे लगा दिए। इन पठानों ने गुरुजी पर धोखे से घातक वार किया, जिससे 7 अक्टूबर 1708 में 42 वर्ष की आयु में गुरुजी (गुरु गोबिन्द सिंह जी) नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। गुरु गोबिंद सिंह ने ही संदेश दिया था कि अब कोई भी देहधारी गुरु नहीं होगा और गुरु वाणी व गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों के लिए गुरु सामान्य होगी। अंत समय में  आपने सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा व खुद भी माथा टेका।

गुरु गोबिंद सिंह द्धारा लड़े हुए कुछ प्रमुख युद्ध –

सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवन में 14 युद्ध किए, इस दौरान उन्हें अपने परिवार के सदस्यों के साथ कुछ बहादुर सिख सैनिकों को भी खोना पड़ा।

गुरु गोबिंद सिंह द्धारा लड़ी गई लड़ाईयां इस प्रकार है –

  • भंगानी का युद्ध (1688) (Battle of Bhangani)
  • नंदौन का युद्ध (1691) (Battle of Nadaun)
  • गुलेर का युद्ध (1696) (Battle of Guler)
  • आनंदपुर का पहला युद्ध (1700) (Battle of Anandpur)
  • निर्मोहगढ़ का युद्ध (1702) (Battle of Nirmohgarh)
  • बसोली का युद्ध (1702) (Battle of Basoli)
  • चमकौर का युद्ध (1704) (Battle of Chamkaur)
  • आनंदपुर का युद्ध (1704) (Second Battle of Anandpur)
  • सरसा का युद्ध (1704) (Battle of Sarsa)
  • मुक्तसर का युद्ध (1705) (Battle of Muktsar)

गुरु गोबिंद सिंह जी की प्रमुख रचनाएं –

  • चंडी दी वार
  • जाप साहिब
  • खालसा महिमा
  • अकाल उस्तत
  • बचित्र नाटक
  • ज़फ़रनामा

गुरुजी ने हमेशा अत्याचार के खिलाफ ही युद्ध किये थे जिसमे उनका कोई आपसी लाभ नहीं था। यही कारण है की लोगों के दिलों में गुरु गोबिन्द जी का वास है और गुरुजी की कही बातों पे आज भी अमल किया जाता है।

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