भगवान झूलेलाल जी का जीवन परिचय

झूलेलाल सिन्धी हिन्दुओं के उपास्य देव हैं जिन्हें ‘इष्ट देव‘ कहा जाता है। उनके उपासक उन्हें वरुण (जल देवता) का अवतार मानते हैं। वरुण देव को सागर के देवता, सत्य के रक्षक और दिव्य दृष्टि वाले देवता के रूप में सिंधी समाज भी पूजता है। उनका विश्वास है कि जल से सभी सुखों की प्राप्ति होती है और जल ही जीवन है।

जल-ज्योति, वरुणावतार, झूलेलाल सिंधियों के ईष्ट देव हैं जिनके आगे दामन फैलाकर सिंधी यही मंगल कामना करते हैं कि सारे विश्व में सुख-शांति, अमन-चैन, कायम रहे और चारों दिशाओं में हरियाली और खुशहाली बने रहे।

 झूलेलाल जी का जन्म –

भगवान झूलेलाल जी का जन्म चैत्र माह, शुक्ल पक्ष  की  द्वितीया को संवत 1007 में  पाकिस्तान के सिंध में नसरपुर में हुआ था। उनकी माता का नाम देवकी और पिता का नाम रतनराय चंद था। झूलेलाल जी के बचपन का नाम उदयचंद था। कहा जाता है कि बचपन में उदयचंद को झूला बहुत प्रिय था, यही कारण है कि बाद में उनका नाम झूलेलाल पड़ गया।

झूलेलाल जी से जुड़ी पौराणिक कथा –

सिंध में पहले हिन्दू राजा का शासन हुआ करता था, राजा धरार आखिरी हिन्दू राजा थे, उन्हें मोहम्मद बिन कासिम ने हरा दिया था। मुस्लिम राजा का सिंध की गद्दी में बैठने के बाद उसके चारों ओर इस्लाम साम्राज्य बढ़ता गया। दसवी सदी के दुसरे भाग में सिंध के ‘थट्टा’ (नसरपुर) राज्य में मकराब खान का शासन था, जिसे शाह सदाकत खान ने मार डाला व अपने आप को मिरक शाह नाम देकर गद्दी पर बैठ गया।

मिरक बहुत दंभी तथा असहिष्णु प्रकृति का था। सदैव अपनी प्रजा पर अत्याचार करता था। मिरक के शासनकाल में सांस्कृतिक और जीवन-मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं था। पूरा सिन्ध प्रदेश मिरक के अत्याचारों से त्रस्त था। उन्हें कोई ऐसा मार्ग नहीं मिल रहा था जिससे वे इस क्रूर शासक के अत्याचारों से मुक्ति पा सकें। मिरक का कहना था, अगर दुनिया में इस्लाम बढेगा, तो जन्नत यही बन जाएगी। उसने यह चेतावनी भी दी कि अगर हिन्दू जनेऊ और चोटी त्याग कर धर्म परिवर्तन नहीं करेंगे, तो उनकी सम्पूर्ण सम्पत्ति जब्त करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया जायेगा। कुछ लोग तो आतंकित होकर मुसलमान बन गये। कुछ शहर छोड़कर भाग गये । कुछ ने तो अपने प्राण ही त्याग डाले । किन्तु शेष बचे हुए हिन्दुओं ने विचार किया कि बादशाह से मिलकर इस आदेश को  रद्द करवा दें । बादशाह ने एक न सुनी। हजारों-लाखों की संख्या में हिन्दू  सिन्धु नदी के किनारे जाकर सबने मिलकर जल देवता दरियाशाह की उपासना और प्रार्थना की, कि इस विपदा में वे उनकी मदद करें । सभी ने लगातर 40 दिनों तक कठिन जप, तप और साधना की। उन्होंने न तो मुंडन किया और न ही नए कपड़े पहने, प्रार्थना की और उपवास किया और भगवान वरुण की स्तुति में गीत गाए। भक्तों को संकट में देखकर वरुण भगवान का मन द्रवित हो उठा। तभी अचानक सिंधु नदी की लहरें आसमान को छूने लगीं और लहरों पर विशाल मछली पर सवार एक अद्भुत आकृति दिखाई दी – पल भर के बाद ही वह आकृति भक्तजनों की आंखों से ओझल हो गई। तभी बादलों के गर्जन के साथ ही एक आकाशवाणी हुई कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए मैं नसरपुर नगर के भक्त रतन राय की धर्मपत्नी माता देवकी के गर्व से मैं जन्म लेकर तुम्हारे कष्ट निवारण करूगां।

 इस प्रकार विक्रम संवत् 1007 के चैत्र शुक्ल द्वितीय को शुक्रवार के दिन श्री रतनराय के घर में एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम उदयचंद रखा गया। उन्हें उडेरोलाल, झूलेलाल, अमरलाल, लालसाई, दरियाशाह, वरुण देवता, जिंदा पीर एवं अन्य कई नामों से सम्बोधित किया गया। जन्म के बाद जब उनके माता पिता ने उनके मुख के अंदर पूरी सिन्धु नदी को देखा, जिसमें पलो नाम की एक मछली भी तैर रही थी, तब वे हैरान रह गए। इसलिए झुलेलाल जी को पलेवारो भी कहा जाता है।

दूसरी ओर मिरक शाह ने सिंध के सभी हिंदुओ को बुलाकर उनसे पुछा, कि वे इस्लाम अपना रहे या म्रत्यु चाहते है। तब झुलेलाल जी का जन्म हो चूका था, सबको उन पर और वरुण देव की भविष्यवाणी पर पूरा विश्वास था, तब सबने मिरक शाह से सोचने के लिए और समय माँगा। मिरक शाह को उस बच्चे के बारे में पता था, लेकिन उसे ये लगता था, कि इतना छोटा बच्चा क्या कर सकता है, यही सोचकर उसने हिंदुओ को और समय दे दिया। मिरक शाह ने अपने अहिरियो (मंत्री) को उस बच्चे की जांच पड़ताल के लिए भेजा व उसे जहर देकर मारने का आदेश दे दिया। जब अहिरियो ने उस नवजात शिशु को देखा तो वह नवजात शिशु युवावस्था में परिवर्तित हो रहा था। अहिरियो को यह सब देखकर अपनी आँखों पर भरोसा ही नही हो रहा था।

झुलेलाल जी ने किशोर अवस्था में ही अपना चमत्कारी पराक्रम दिखाकर जनता को ढांढस बंधाया और यौवन में प्रवेश करते ही जनता से कहा कि बेखौफ अपना काम करें। झुलेलाल जी ने बादशाह को संदेश भेजा कि हिंदू-मुसलमान को एक ही समझे और अपनी प्रजा पर अत्याचार न करे, लेकिन मिरक शाह नहीं माना।

मिरक शाह ने अपने अहिरियो (मंत्री) से झुलेलाल जी के साथ एक निजी बैठक की व्यवस्था करने को कहा। मिरक शाह के सामने झुलेलाल जी आये और जिद्दी शासक को समझाया: “जो कुछ भी तुम अपने चारों ओर देखते हो वह केवल एक ईश्वर की रचना है, जिसे तुम ‘अल्लाह‘ कहते हो और हिंदू ‘ईश्वर‘ कहते हैं।” मिरक शाह ने सैनिकों को झुलेलाल जी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया।

जैसे ही दरबार के अधिकारी झुलेलाल जी की ओर बढ़े, पानी की बड़ी-बड़ी लहरें आंगन को चीरती हुई आगे निकल गईं और मिरकशाह और उनके दरबारियों को डुबोने लगी । झुलेलाल जी ने फिर से कहा, “मिरक शाह, इसे खत्म कर दो। तुम्हारा भगवान और मेरा भगवान एक ही है। फिर, तुमने मेरे लोगों को क्यों सताया मिरक शाह घबरा गया और उसने झुलेलाल जी से विनती की, “मेरे भगवान, मुझे अपनी मूर्खता का एहसास है। कृपया मुझे और मेरे दरबारियों को बचा लो। मिरक शाह ने सम्मानपूर्वक नमन किया और हिंदुओं और मुसलमानों के साथ एक जैसा व्यवहार करने के लिए सहमत  हुआ ।

उसके बाद श्री झूलेलाल जी ने नगर-नगर भ्रमण कर साम्प्रदायिक सद्भाव, एकता एवं अखण्डता का प्रचार किया। संवत 1020 के भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी पर वरुणावतार श्री झूलेलाल जी जल समाधि लेकर अंतर्ध्यान हो गये। उस पवित्र स्थान पर हिन्दू प्रजा ने मंदिर बनवाया, जहां अखण्ड ज्योति जलती रहती है।

भगवान झूलेलाल के संदेश

सर्वधर्म समभाव तथा कर्म की शिक्षा देने वाले झूलेलाल जी ने मानव कल्याण के लिए कुछ संदेश दिए जिन्हें यहाँ सिंधी तथा हिंदी भाषा में बता रहे हैं।

  • ईश्वर अल्लाह हिक आहे अर्थात ईश्वर अल्लाह एक हैं।
  • कट्टरता छदे, नफरत, ऊंच-नीच एं छुआछूत जी दीवार तोड़े करे पहिंजे हिरदे में मेल-मिलाप, एकता, सहनशीलता एं भाईचारे जी जोत जगायो अर्थात विकृत धर्माधता, घृणा, ऊंच-नीच और छुआछूत की दीवारे तोड़ो और अपने हृदय में मेल-मिलाप, एकता, सहिष्णुता, भाईचारा और धर्म निरपेक्षता के दीप जलाओ।
  • सभनि हद खुशहाली हुजे अर्थात सब जगह खुशहाली हो।
  • सजी सृष्टि हिक आहे एं असां सभ हिक परिवार आहियू अर्थात सारी सृष्टि एक है, हम सब एक परिवार है।

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