मोहिनी एकादशी – तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्‍व

मोहिनी एकादशी तिथि 3 मई 2020 को प्रात: 9 बजकर 9 मिनट से प्रारंभ होगी. 4 मई को 6 बजकर 12 मिनट पर तिथि का समापन होगा. पारण का समय: 4 मई को दोपहर 1 बजकर 38 मिनट से शाम 4 बजकर 18 मिनट तक होगा।

वैशाख महीने के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी आती है। मोहिनी एकादशी इस बार 3 मई को मनाई जा रही है। द्वादशी के दिन एकादशी व्रत का पारण किया जाता है।

मोहिनी एकादशी-

पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन जब हो रहा था तो अमृत कलश के लिए देवताओं और दानवों में घमासन मच गया. विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई. तब भगवान् विष्णु ने एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण किया. इस सुंदर स्त्री का रूप देखकर असुर मोहित हो उठे तब श्रीहर‍ि ने अमृत कलश लेकर देवताओं को सारा अमृत पीला दिया. इस प्रकार से देवता अमृत पीकर अमर हो गए। मान्‍यता है कि भगवान विष्‍णु ने वैशाख शुक्‍ल एकादशी के दिन ही मोहिनी (Mohini) का रूप धारण किया था। इसी वजह से इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है।

मोहिनी एकादशी की व्रत  कथा-

सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम का एक नगर था। जहां पर एक धनपाल नाम का वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से परिपूर्ण था। वह सदा पुण्य कर्म में ही लगा रहता था। उसके 5 पुत्र थे- सुमना, सद्‍बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि। धनपाल के अन्‍य पुत्र तो उसी की ही भांति थे। लेकिन धृष्‍ट्बुद्धि हमेशा ही पापकर्मों में लिप्‍त रहता था व अपने पिता का धन लुटाता रहता था। वह वेश्या, दुराचारी मनुष्यों की संगति में रहकर जुआ खेलता और पर-स्त्री के साथ भोग-विलास करता तथा मद्य-मांस का सेवन करता था। इससे नाराज होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया ।

उसकी खराब आदतों की वजह से किसी ने कुछ भी खाने-पीने को नहीं द‍िया। भूख-प्‍यास से व्‍याकुल धृष्‍ट्बुद्धि महर्षि कौंड‍िन्‍य के आश्रम जा पहुंचा उस समय वैशाख मास था और ऋषि गंगा स्नान कर आ रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे कुछ सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई।

वह कौडिन्य मुनि से हाथ जोड़कर कहने लगा कि हे मुने! मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं। मुझ पर दया कीजिए और कोई ऐसा व्रत बताइए जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।तब ऋषि कौण्डिल्य ने बताया कि वैशाख मास के शुक्लपक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। धृष्टबुद्धि ने ऋषि की बताई विधि के अनुसार व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक को गया। इस व्रत से मोह आदि सब नष्ट हो जाते हैं। संसार में इस व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है। इसके माहात्म्य को पढ़ने से अथवा सुनने से एक हजार गौदान का फल प्राप्त होता है।

पूजन विधि

मोहिनी एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें. इसके बाद स्‍नान करने के बाद स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें व्रत का संकल्‍प लें. अब घर के मंदिर में भगवान विष्‍णु की प्रतिमा, फोटो या कैलेंडर के सामने दीपक जलाएं. इसके बाद विष्‍णु की प्रतिमा को अक्षत, फूल, मौसमी फल, नारियल और मेवे चढ़ाएं. विष्‍णु की पूजा करते वक्‍त तुलसी के पत्ते अवश्‍य रखें. इसके बाद धूप दिखाकर श्री हरि विष्‍णु की आरती उतारें. अब सूर्यदेव को जल अर्पित करें. एकादशी की कथा सुनें या सुनाएं.

मोहिनी एकादशी का व्रत कैसे करें-

 एकादशी से एक दिन पूर्व ही व्रत के नियमों का पालन करें.
 व्रत के दिन निर्जला व्रत करें.
 शाम के समय तुलसी के पास गाय के घी का एक दीपक जलाएं .
 रात के समय सोना नहीं चाहिए. भगवान का भजन-कीर्तन करना चाहिए.
 अगले दिन पारण के समय किसी ब्राह्मण या गरीब को यथाशक्ति भोजन कराए और दक्षिणा देकर विदा करें.
 इसके बाद अन्‍न और जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें.

मोहिनी एकादशी व्रत के नियम-

 कांसे के बर्तन में भोजन न करें
 नॉन वेज, मसूर की दाल, चने व कोदों की सब्‍जी और शहद का सेवन न करें.
 कामवासना का त्‍याग करें.
 व्रत वाले दिन जुआ नहीं खेलना चाहिए.
 पान खाने और दातुन करने की मनाही है.

 

 

 

 

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